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सारस्वत (दधीचि पुत्र) - भारतकोश, ज्ञान का हिन्दी महासागर

सारस्वत (दधीचि पुत्र)  

Disamb2.jpg सारस्वत एक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- सारस्वत (बहुविकल्पी)

सारस्वत ऋषि दधीचि और सरस्वती के पुत्र थे। इनका प्रमुख कार्य वेद-पाठ आदि करना था। देवासुर संग्राम में दधीचि की अस्थियों से निर्मित वज्र के प्रयोग के कारण काफ़ी समय तक अनावृष्टि नहीं हुई। सब जगह भोजन आदि का अभाव होने लगा। यह जानकर कि ब्राह्मण लोग वेद-पाठ की विद्या आदि को भली प्रकार नहीं जानते हैं, इसीलिए सब लोगों ने सारस्वत को अपना गुरु स्वीकार किया और धर्म का अनुष्ठान किया।

कथा

ब्रह्मा के पुत्र भृगु ने तपस्या से युक्त लोक-मंगलकारी दधीचि को उत्पन्न किया था। मुनि दधीचि की घोर तपस्या से इंद्र भयभीत हो उठे। अत: उन्होंने अनेक फलों-फूलों इत्यादि से मुनि को रिझाने के असफल प्रयास किये। अन्त में इंद्र ने 'अलंबूषा' नाम की एक अप्सरा को दधीचि का तप भंग करने के लिए भेजा। दधीचि इस समय देवताओं का तर्पण कर रहे थे। सुन्दरी अप्सरा को वहाँ देखकर उनका वीर्य रुस्खलित हो गया। सरस्वती नदी ने उस वीर्य को अपनी कुक्षी में धारण किया तथा एक पुत्र के रूप में जन्म दिया, जो कि 'सारस्वत' कहलाया। पुत्र को लेकर वह दधीचि के पास गई तथा पूर्वघटित सब याद दिलाया। दधीचि ने प्रसन्नतापूर्वक अपने पुत्र का माथा सूँघा और सरस्वती को वर दिया कि अनावृष्टि के बारह वर्ष में वही देवताओं, पितृगणों, अप्सराओं और गंधर्वों को तृप्त करेगी। नदी अपने पुत्र को लेकर पुन: चली गई।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. दधीचि महाभारत, शल्य पर्व, 51|5-53

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