धर्म  

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धर्मों के प्रतीक

(संस्कृत शब्द, अर्थात् जो स्थापित हो यानी धर्म, रीति, विधि या कर्तव्य), पालि शब्द, धम्म। हिन्दू, बौद्ध और जैन धर्म में बहुअर्थी मूल अवधारणा। आज धर्म के जिस रूप को प्रचारित एवं व्याख्यायित किया जा रहा है उससे बचने की ज़रूरत है। मूलतः धर्म संप्रदाय नहीं है। ज़िंदगी में हमें जो धारण करना चाहिए, वही धर्म है। नैतिक मूल्यों का आचरण ही धर्म है। धर्म वह पवित्र अनुष्ठान है जिससे चेतना का शुद्धिकरण होता है। धर्म वह तत्व है जिसके आचरण से व्यक्ति अपने जीवन को चरितार्थ कर पाता है। यह मनुष्य में मानवीय गुणों के विकास की प्रभावना है, सार्वभौम चेतना का सत्संकल्प है। मध्ययुग में विकसित धर्म एवं दर्शन के परम्परागत स्वरूप एवं धारणाओं के प्रति आज के व्यक्ति की आस्था कम होती जा रही है। मध्ययुगीन धर्म एवं दर्शन के प्रमुख प्रतिमान थे- स्वर्ग की कल्पना, सृष्टि एवं जीवों के कर्ता रूप में ईश्वर की कल्पना, वर्तमान जीवन की निरर्थकता का बोध, अपने देश एवं काल की माया एवं प्रपंचों से परिपूर्ण अवधारणा। उस युग में व्यक्ति का ध्यान अपने श्रेष्ठ आचरण, श्रम एवं पुरुषार्थ द्वारा अपने वर्तमान जीवन की समस्याओं का समाधान करने की ओर कम था, अपने आराध्य की स्तुति एवं जय गान करने में अधिक था।
धर्म के व्याख्याताओं ने संसार के प्रत्येक क्रियाकलाप को ईश्वर की इच्छा माना तथा मनुष्य को ईश्वर के हाथों की कठपुतली के रूप में स्वीकार किया। दार्शनिकों ने व्यक्ति के वर्तमान जीवन की विपन्नता का हेतु 'कर्म-सिद्धान्त' के सूत्र में प्रतिपादित किया। इसकी परिणति मध्ययुग में यह हुई कि वर्तमान की सारी मुसीबतों का कारण 'भाग्य' अथवा ईश्वर की मर्जी को मान लिया गया। धर्म के ठेकेदारों ने पुरुषार्थवादी-मार्ग के मुख्य-द्वार पर ताला लगा दिया। समाज या देश की विपन्नता को उसकी नियति मान लिया गया। समाज स्वयं भी भाग्यवादी बनकर अपनी सुख-दुःखात्मक स्थितियों से सन्तोष करता रहा। आज के युग ने यह चेतना प्रदान की है कि विकास का रास्ता हमें स्वयं बनाना है। किसी समाज या देश की समस्याओं का समाधान कर्म-कौशल, व्यवस्था-परिवर्तन, वैज्ञानिक तथा तकनीकी विकास, परिश्रम तथा निष्ठा से सम्भव है। आज के मनुष्य की रुचि अपने वर्तमान जीवन को सँवारने में अधिक है। उसका ध्यान 'भविष्योन्मुखी' न होकर वर्तमान में है। वह दिव्यताओं को अपनी ही धरती पर उतार लाने के प्रयास में लगा हुआ है। वह पृथ्वी को ही स्वर्ग बना देने के लिए बेताब है।[1]
हिन्दू धर्म में धार्मिक और नैतिक नियम है, जो व्यक्तिगत और सामूहिक आचरण को शासित करते हैं। यह जीवन के चार साध्यों में से एक है। प्रासंगिक संवेदनशीलता इसके विशिष्ट लक्षणों में से एक है। यद्यपि धर्म के कुछ पहलुओं को सार्वभौमिक और चिरस्थायी माना जाता है, अन्य का पालन लोगों को अपनी श्रेणी, स्तर और लक्ष्य के अनुसार करना होता है। धर्म हिन्दू विधि के आरंभिक स्रोत धर्मसूत्र, जो नीतिशास्त्र व सामाजिक संगठन की नियमावली और विषय–वस्तु है। यह नियमावली समय के साथ विधि एवं परंपरा के संग्रह के रूप में विस्तृत हुई, जो धर्मशास्त्र कहलाई। सर्वाधिक ज्ञात धर्मशास्त्र मनुस्मृति है, जो प्रारंभिक शताब्दियों तक प्रामाणिक बन गया था, परंतु यह प्रश्न अभी तक अनुत्तरित है कि ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा इसके कुछ पहलुओं को औपनिवेशिक क़ानून में समाहित कर लिये जाने से पहले यह कभी वास्तविक न्यायिक प्रक्रिया में क्रियाशील था भी अथवा नहीं।

  • बौद्धों में धर्म प्रत्येक व्यक्ति के लिये सर्वकालिक सार्वभौमिक सत्य है, जैसा गौतम बुद्ध ने खोजा व घोषित किया था। धर्म, बुद्ध और संघ (बौद्ध मठ व्यवस्था) मिलकर ‘त्रिरत्न’ या तीन रत्न हैं। जो बौद्ध सिद्धांत और आचरण के प्राथमिक स्रोत हैं। बौद्ध अध्यात्म में बहुवचन के रूप में इस शब्द का उपयोग उन अंर्तसंबंधित तत्त्वों के उल्लेख के लिए होता है, जो अनुभवजन्य विश्व की रचना करते हैं।
  • जैन दर्शन में धर्म आमतौर पर नैतिक मूल्य के रूप में समझे जाने के अलावा एक विशिष्ट अर्थ रखता है, शाश्वत वस्तु (द्रव्य) का एक सहायक माध्यम, जो मनुष्य को आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

धर्म का महत्त्व

भारतीय संस्कृति में विभिन्नता उसका दूषण नहीं वरन् भूषण है। यहाँ हिन्दू धर्म के अगणित रूपों और संप्रदायों के अतिरिक्त, बौद्ध, जैन, सिक्ख, इस्लाम, ईसाई, यहूदी आदि धर्मों की विविधता का भी एक सांस्कृतिक समायोजन देखने को मिलता है। हिन्दू धर्म के विविध सम्प्रदाय एवं मत सारे देश में फैले हुए हैं, जैसे वैदिक धर्म, शैव, वैष्णव, शाक्त आदि पौराणिक धर्म, राधा-बल्लभ संप्रदाय, श्री संप्रदाय, आर्यसमाज, समाज आदि। परन्तु इन सभी मतवादों में सनातन धर्म की एकरसता खण्डित न होकर विविध रूपों में गठित होती है। यहाँ के निवासियों में भाषा की विविधता भी इस देश की मूलभूत सांस्कृतिक एकता के लिए बाधक न होकर साधक प्रतीत होती है।

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हर दशा में दूसरे सम्प्रदायों का आदर करना ही चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य अपने सम्प्रदाय की उन्नति और दूसरे सम्प्रदायों का उपकार करता है। इसके विपरीत जो करता है वह अपने सम्प्रदाय की (जड़) काटता है और दूसरे सम्प्रदायों का भी अपकार करता है। क्योंकि जो अपने सम्प्रदाय की भक्ति में आकर इस विचार से कि मेरे सम्प्रदाय का गौरव बढ़े, अपने सम्प्रदाय की प्रशंसा करता है और दूसरे सम्प्रदाय की निन्दा करता है, वह ऐसा करके वास्तव में अपने सम्प्रदाय को ही गहरी हानि पहुँचाता है। इसलिए समवाय (परस्पर मेलजोल से रहना) ही अच्छा है अर्थात् लोग एक-दूसरे के धर्म को ध्यान देकर सुनें और उसकी सेवा करें।[2]

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- सम्राट अशोक

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. जैन, प्रोफेसर महावीर सरन। विकास का रास्ता स्वयं बनाएँ (हिंदी) वेबदुनिया हिंदी। अभिगमन तिथि: 6 अगस्त, 2013।
  2. गिरनार का बारहवाँ शिलालेख "अशोक के धर्म लेख" से पृष्ठ सं- 31
  3. जैन, प्रोफेसर महावीर सरन। महावीर सरन जैन का आलेख : भगवान महावीर (हिंदी) रचनाकार (ब्लॉग)। अभिगमन तिथि: 6 अगस्त, 2013।

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