अंगद  

Disamb2.jpg अंगद एक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- अंगद (बहुविकल्पी)
सुग्रीव तथा अंगद

अंगद बालि के पुत्र थे। बालि इनसे सर्वाधिक प्रेम करता था। ये परम बुद्धिमान, अपने पिता के समान बलशाली तथा भगवान श्रीराम के परम भक्त थे। अपने छोटे भाई सुग्रीव की पत्नी और सर्वस्व हरण करने के अपराध में भगवान श्रीराम के हाथों बालि की मृत्यु हुई। मरते समय बालि ने भगवान राम को ईश्वर के रूप में पहचाना और अपने पुत्र अंगद को उनके चरणों में सेवक के रूप में समर्पित कर दिया। प्रभु राम ने बालि की अन्तिम इच्छा का सम्मान करते हुए अंगद को स्वीकार किया। सुग्रीव को किष्किन्धा का राज्य मिला और अंगद युवराज बनाये गये।

वानर सेना का नेतृत्व

सीता की खोज में वानरी सेना का नेतृत्व युवराज अंगद ने ही किया। सम्पाती से सीता के लंका में होने की बात जानकर अंगद समुद्र पार जाने के लिये तैयार हो गये, किन्तु दल का नेता होने के कारण जामवन्त ने इन्हें जाने नहीं दिया और हनुमान लंका गये।

श्रीराम के विश्वासपात्र

भगवान श्रीराम को अंगद के शौर्य और बुद्धिमत्ता पर पूर्ण विश्वास था, इसीलिये उन्होंने रावण की सभा में युवराज अंगद को अपना दूत बनाकर भेजा और यह कहलवाया कि यदि रावण सीता को सम्मान सहित वापस लौटा दे तो वह युद्ध नहीं करेंगे। रावण नीतिज्ञ था। उसने भेदनीति से काम लेते हुए अंगद जी से कहा- "बालि मेरा मित्र था। ये राम-लक्ष्मण बालि को मारने वाले हैं। यह बड़ी लज्जा की बात है कि तुम अपने पितृघातियों के लिये दूतकर्म कर रहे हो।" युवराज अंगद ने रावण को फटकारते हुए कहा- "मूर्ख रावण! तुम्हारी इन बातों से केवल उनके मन में भेद पैदा हो सकता है, जिनकी श्रीराम के प्रति भक्ति नहीं है। बालि ने जो किया, उसे उसका फल मिला। तुम भी थोड़े दिनों बाद जाकर वहीं यमलोक में अपने मित्र का समाचार पूछना।

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