सम्पाती  

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संपाती / सम्पाती

  • संपाती नामक गृध्र जटायु का बड़ा भाई था। वृत्तासुर-वध के उपरांत अत्यधिक गर्व हो जाने के कारण दोनों भाई आकाश में उड़कर सूर्य की ओर चले। उन दोनों का उद्देश्य सूर्य का विंध्याचल तक पीछा करना था। सूर्य के ताप से जटायु के पंख जलने लगे तो संपाती ने उसे अपने पंखों से छिपा लिया। अत: जटायु तो बच गया किंतु संपाती के पर जल गये और उड़ने की शक्ति समाप्त हो गयी। वह विंध्य पर्वत पर जा गिरा। जब सीता को ढूंढ़ने में असफल हनुमान, अंगद आदि उस पर्वत पर बातें कर रहे थे तब जटायु का नाम सुनकर संपाति ने सविस्तार जटायु के विषय में जानना चाहा। यह जानकर कि वह रावण द्वारा मारा गया है, उन्हें बताया कि पूर्वकाल में जब पंख जलने पर वह विंध्य पर्वत पर गिरा था तब वह छ: दिन अचेत रहा, तदुपरांत वह निशाकर नाम के महामुनि की गुफ़ा में गया। निशाकर का उन दोनों भाइयों से अपार प्रेम था। निशाकर ने संपाती से कहा कि वह बहुत जल गया है, भविष्य में उसके पंख और उसका सौदर्य लौट जायेंगे किंतु अभी ठीक नहीं होगा क्योंकि बिना पंख के वहां पर्वत पर रहने से वह भविष्य में उत्पन्न होने वाले दशरथ-पुत्र राम की खोयी हुई पत्नी का मार्ग बतायेगा तथा इसी प्रकार के अनेक अन्य उपकार भी कर पावेगा। संपाती ने दिव्य दृष्टि से सीता को रावण की नगरी में देखा तथा वानरों का पथ-निर्देशन किया, तभी देखते-देखते उसके दो लाल पंख निकल आये।[1]
  • संपाती के पुत्र का नाम सुपार्श्व था। पंख जल जाने के कारण संपाती उड़ने में असमर्थ था, अत: सुपार्श्व उसके लिए भोजन जुटाया करता था। एक शाम सुपार्श्व बिना मांस लिये अपने पिता के पास पहुंचा तो भूखे संपाती को बहुत ग़ुस्सा आया। उसने मांस न लाने का कारण पूछा तो सुपार्श्व ने बतलाया-'कोई काला राक्षस सुंदरी नारी को लिये चला जा रहा था। वह स्त्री 'हा राम, हा लक्ष्मण!' कहकर विलाप कर रही थी। यह देखने में मैं इतना उलझ गया कि मांस लाने का ध्यान नहीं रहा।'[2]
  • संपाति जटायु का भाई था। हनुमान जब सीता को ढूंढ़ने जा रहा था तब मार्ग में गरुड़ के समान विशाल पक्षी से उसका परिचय हुआ। उसका परिचय प्राप्त कर वानरों ने जटायु की दु:खद मृत्यु का समाचार उसे दिया। उसी ने वानरों को लंकापुरी जाने के लिए उत्साहित किया था।[3]


टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. बाल्मीकि रामायण, किष्किंधा कांड,सर्ग 56-58 तथा 61, 62, 63
  2. बाल्मीकि रामायण, किष्किंधा कांड, सर्ग 59
  3. महाभारत, वनपर्व, 282-46-57 तक

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