गांधारी  

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संक्षिप्त परिचय
गांधारी
गांधारी तथा धृतराष्ट्र
पिता सुबल
समय-काल महाभारत
परिजन धृतराष्ट्र, शकुनि, दुर्योधन, दु:शासन, दु:शला
विवाह धृतराष्ट्र
संतान दुर्योधन, दु:शासन आदि कौरव
निवास हस्तिनापुर
अन्य विवरण काफ़ी समय तक संतान न होने पर गांधारी ने मुक्के के प्रहार से अपना गर्भ गिरा दिया था, किंतु भगवान शिव के वरदान और महर्षि व्यास की कृपा से इन्हें सौ कौरवों की प्राप्ति हुई।
मृत्यु दावाग्नि में जलकर
यशकीर्ति द्यूतक्रीड़ा में पाण्डवों के हार जाने पर जब दुर्योधन भरी सभा में द्रौपदी का का अपमान कर रहा था, तब गांधारी ने ही इसका विरोध किया।
संबंधित लेख धृतराष्ट्र, दुर्योधन, कौरव
विशेष गांधारी ने श्रीकृष्ण को यह शाप दिया कि जिस प्रकार कुरु वंश का नाश हुआ है, उसी प्रकार यदुकुल का भी नाश होगा।
अन्य जानकारी गांधारी के पति महाराज धृतराष्ट्र नेत्रहीन थे, इसीलिए इन्होंने भी अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली और उसे आजन्म बाँधे रहीं। महाभारत युद्ध के बाद गांधारी भी पति भी के साथ वन में चली गईं।

गांधारी गांधार देश के 'सुबल' नामक राजा की कन्या थीं। क्योंकि वह गांधार की राजकुमारी थीं, इसीलिए उनका नाम गांधारी पड़ा। यह हस्तिनापुर के महाराज धृतराष्ट्र की पत्नी और दुर्योधन आदि कौरवों की माता थीं। गांधारी की भगवान शिव में विशेष आस्था थी, और ये शिव की परम भक्त थीं। एक पतिव्रता के रूप में गांधारी आदर्श नारी सिद्ध हुई थीं। अपने पति धृतराष्ट्र के अन्धा होने के कारण विवाहोपरांत ही गांधारी ने भी आँखों पर पट्टी बाँध ली तथा उसे आजन्म बाँधे रहीं। महाभारत के अनन्तर गांधारी अपने पति, कुंती और विदुर के साथ वन में चली गयीं, जहाँ दावाग्नि[1] में वे जलकर भस्म हो गयीं।

परिचय

संसार की पतिव्रता और महान् नारियों में गांधारी का विशेष स्थान है। गांधार के राजा सुबल इनके पिता और शकुनि भाई थे। जब गांधारी का विवाह नेत्रहीन धृतराष्ट्र से हुआ, तभी से गांधारी ने भी अपनी आँखों पर पट्टी बाँध ली। इन्होंने सोचा कि जब मेरे पति ही नेत्रहीन हैं, तब मुझे संसार को देखने का अधिकार नहीं है। पति के लिये इन्द्रियसुख के त्याग का ऐसा उदाहरण अन्यत्र नहीं मिलता। किंतु गांधारी का भाई शकुनि इस विवाह से प्रसन्न नहीं था, क्योंकि नेत्रहीन धृतराष्ट्र के साथ गांधारी के विवाह का प्रस्ताव लेकर जब गंगापुत्र भीष्म सुबल के पास पहुँचे, तब शकुनि ने इसे अपने पिता तथा स्वयं का बहुत बड़ा अपमान माना। शकुनि इस बात से बड़ा क्रोधित था कि उसकी बहन के लिए भीष्म एक नेत्रहीन व्यक्ति का प्रस्ताव लेकर आये हैं। शकुनि ने इसी दिन यह प्रण कर लिया था कि वह हस्तिनापुर में कभी सुख-शांति नहीं रहने देगा। महाभारत युद्ध के लिए जो परिस्थितियाँ ज़िम्मेदार थीं, उनके लिए गांधारी का भाई शकुनि भी एक बड़ा कारण था।

विवाह और संतान

गांधारी भगवान शिव की आराधना से सौ पुत्रों की माता बनने का वरदान पा चुकी थीं। भीष्म की प्रेरणा से धृतराष्ट्र का विवाह गांधारी के साथ किया गया। गांधारी ने जब सुना कि उसका भावी पति अंधा है तो उसने भी अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली, जिससे कि पतिव्रत धर्म का पालन कर पाये। एक दिन जब महर्षि व्यास अत्यंत थके हुए तथा भूखे थे, वे महल में पधारे। ऐसे समय में गांधारी ने उनका आदर-सत्कार किया। प्रसन्न होकर व्यास ने गांधारी को अपने पति के अनुरूप सौ पुत्र प्राप्त करने का वरदान दिया। गर्भाधान के उपरांत दो वर्ष बीत गये। कुंती ने एक पुत्र प्राप्त भी कर लिया, किंतु गांधारी ने संतान को जन्म नहीं दिया। अत: क्रोध और ईर्ष्या के वशीभूत उसने अपने उदर पर प्रहार किया, जिससे लोहे के समान कठोर मांसपिंड निकला। व्यास जी के प्रकट होने पर गांधारी ने उन्हें सब कुछ कह सुनाया। व्यास ने एक गुप्त स्थान पर घी से भरे हुए एक सौ एक मटके रखवा दिये। मांस-पिंड को शीतल जल से धोने पर उसके एक सौ एक खंड हो गये। प्रत्येक खंड एक-एक मटके में दो वर्ष के लिए रख दिया गया। उसके बाद ढक्कन खोलने पर प्रत्येक मटके से एक-एक बालक प्रकट हुआ। अंतिम मटके से एक कन्या प्राप्त हुई, उसका नाम दु:शला रखा गया तथा उसका विवाह जयद्रथ से हुआ।

ज्योष्ठ पुत्र दुर्योधन

पहला मटका खोलने पर जो बालक प्रकट हुआ था, उसका नाम दुर्योधन हुआ। उसने जन्म लेते ही बुरी तरह से बोलना प्रारंभ कर दिया। इस समय प्रकृति में कई अपशकुन प्रकट हुए। पंडितों ने महाराज धृतराष्ट्र से कहा कि इस बालक का परित्याग कर देने से कौरव वंश की रक्षा हो सकती है अन्यथा अनर्थ होगा, किंतु मोह वश गांधारी तथा धृतराष्ट्र ने उसका परित्याग नहीं किया। उसी दिन कुंती के घर में भीम ने जन्म लिया। धृतराष्ट्र की एक वैश्य जाति की सेविका थी, जिससे धृतराष्ट्र को युयुत्सुकरण नामक पुत्र की प्राप्ति हुई।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. वन में लगी आग
  2. महाभारत, आदिपर्व, अध्याय 109, 114 115, स्त्रीपर्व 21-25, शल्यपर्व 63
  3. पाँच पाण्डव और सौ कौरवों के नाम (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 19 जुलाई, 2013।

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