प्रहस्त  

प्रहस्त लंका के राजा रावण का मंत्री और वीर सेनापति था। युद्ध में अकम्पन की मृत्यु हो जाने के बाद रावण ने अपने वीर सेनापति प्रहस्त को युद्ध के लिए भेजा था। प्रहस्त ने राम की वानर सेना के साथ बड़ा ही भयंकर युद्ध किया। उसकी राक्षस सेना ने एक बार के लिए वानरों को भी भयभीत कर दिया। इस समय असंख्य वानर वीर वीरगति को प्राप्त हुए। वानर सेनापति नील और प्रहस्त का युद्ध भी बहुत भयंकर था। नील ने एक बड़ी सी शिला उठाकर प्रहस्त के सिर पर दे मारी, जिससे उसका सिर फट गया और वह मृत्यु को प्राप्त हुआ।
नोट नोट: प्रहस्त अथवा प्रहस्थ को कई लेखों में रावण का पुत्र भी माना गया है।[1]

रावण का आदेश

अकम्पन की मृत्यु से रावण को भारी आघात पहुँचा था। रात्रि को वह शान्ति से विश्राम भी न कर सका। दूसरे दिन उसने मन्त्रियों को बुलाकर कहा, "वानरों की सेना हमारी कल्पना से भी अधिक शक्तिशाली और पराक्रमी सिद्ध हुई है। पिछले चार दिनों में हमारी बहुत सी सेना मारी जा चुकी है। सैनिकों का मनोबल टूटने लगा है। नागरिकों को शत्रु के घेरे के कारण बाहर से उपलब्ध होने वाली खाद्य सामग्री प्राप्त नहीं हो रही है। वे अत्यन्त दुःखी हो रहे हैं। चार दिन के युद्ध को देखकर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि शत्रु पर विजय प्राप्त करना साधारण राक्षसों के लिये सम्भव नहीं है। इसलिये हे वीर प्रहस्त! मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि शत्रु को परास्त करने के लिये कुम्भकर्ण, मेघनाद, तुम्हें अथवा मुझे ही आगे आना पड़ेगा। अतः आज युद्ध का नेतृत्व तुम करो। तुम युद्ध कला विशारद हो। ये वानर चंचल और वीर तो हैं, परन्तु प्रशिक्षित नहीं हैं। तुम युद्ध नीति से उन पर विजय प्राप्त कर सकते हो। इसलिये हे वीर! तुम शीघ्र जाकर राम-लक्ष्मण सहित समस्त शत्रुओं का संहार कर मुझे निश्‍चिंत करो।"[2]

युद्ध के लिए प्रस्थान

स्वयं पर रावण का इतना विश्‍वास देखकर प्रहस्त ने कहा, "आज मैं अपने अतुल पराक्रम से शत्रु सेना का विनाश करके आप को निश्‍चिंत कर दूँगा। आज मेरे कृपाण के शौर्य से मैं रणचण्डी को प्रसन्न करके चील, कौवों, गीदड़ों आदि को शत्रु का माँस खिलाकर तृप्त करूँगा।" इतना कहकर वह भयानक राक्षसों की सेना को लेकर युद्ध स्थल की ओर चल दिया। प्रहस्त को दल-बल के साथ आते देख श्रीराम ने विभीषण से पूछा- "यह विशाल देह वाला सेनापति कौन है?" विभीषण ने उत्तर दिया- "हे रघुकुलतिलक! यह रावण का मन्त्री और वीर सेनापति प्रहस्त है। लंका की सेना का तीसरा भाग इसके अधिकार में है। यह बड़ा बलवान, पराक्रमी तथा युद्धकला विशारद है।" यह सुनकर श्रीराम ने सुग्रीव से कहा- "हे वानराधिपति! ऐसा प्रतीत होता है कि रावण को इस पर बहुत विश्‍वास है। तुम इसे मारकर रावण का विश्‍वास भंग करो। इसके मरने पर रावण का मनोबल गिर जायेगा।"

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. रावण के पुत्र (The Rednews)
  2. 2.0 2.1 प्रहस्त का वध, युद्धकाण्ड-11 (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 08 जनवरी, 2014।

संबंधित लेख

और पढ़ें

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः



"http://m.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=प्रहस्त&oldid=565933" से लिया गया