उत्तर कुरु  

वाल्मीकि रामायण[1] में इस प्रदेश का सुन्दर वर्णन है। कुछ विद्वानों के मत में उत्तरी ध्रुव के निकटवर्ती प्रदेश को ही प्राचीन साहित्य में विशेषत: रामायण और महाभारत में उत्तर कुरु कहा गया है और यही आर्यों की आदि भूमि थी। यह मत लोकमान्य तिलक ने अपने ओरियन नामक अंग्रेज़ी ग्रन्थ में प्रतिपादित किया है। वाल्मीकि ने जो वर्णन रामायण[2] में उत्तर कुरु प्रदेश का किया है उसके अनुसार उत्तर कुरु में शैलोदा नदी बहती थी और वहाँ मूल्यवान् रत्न और मणि उत्पन्न होते थे-

'तमविक्रम्य शैलेन्द्रमुत्तर: पयसां निधि:,
तत्र सोमगिरिर्नाम मध्ये हेममयो महान्।
सतुदेशो विसूर्योपि तस्य भासा प्रकाशते,
सूर्यलक्ष्याभिविज्ञेयस्तपतेव विवस्वता'।[3]

अर्थात् सुग्रीव वानरों की सेना को उत्तर दिशा में भेजते हुए कहता है कि 'वहाँ से आगे जाने पर उत्तम समुद्र मिलेगा जिसके बीच में सुवर्णमय सोमगिरि नामक पर्वत है। वह देश सूर्यहीन है किंतु सूर्य के न रहने पर भी उस पर्वत के प्रकाश से सूर्य के प्रकाश के समान ही वहाँ उजाला रहता है।' सोमगिरि की प्रभा से प्रकाशित इस सूर्यहीन उत्तर दिशा में स्थित प्रदेश के वर्णन में उत्तरी नार्वे तथा अन्य उत्त रध्रुवीय देशों में दृश्यमान मेरुप्रभा या अरोरा बोरियालिस नामक अद्भुत दृश्य का काव्यमय उल्लेख हो सकता है जो वर्ष में छ: मास के लगभग सूर्य के क्षितिज के नीचे रहने के समय दिखाई देता है। इसी सर्ग के 56वें श्लोक में सुग्रीव ने वानरों से यह भी कहा कि उत्तर कुरु के आगे तुम लोग किसी प्रकार नहीं जा सकते और न अन्य प्राणियों की ही वहाँ गति है-

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  • ऐतिहासिक स्थानावली | पृष्ठ संख्या= 90-91| विजयेन्द्र कुमार माथुर | वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग | मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार

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