रक्षाबन्धन  

रक्षाबन्धन
कलाई पर राखी
अन्य नाम राखी, सलूनो, सावनी
अनुयायी हिन्दू और लगभग हर भारतीय
उद्देश्य भाई-बहन के प्रेम व रक्षा का पवित्र त्योहार
प्रारम्भ पौराणिक काल
तिथि श्रावण मास की पूर्णिमा
उत्सव घरों को लीप-पोत कर दरवाज़ों पर आम तथा केले के पत्तों के बन्दनवार लगाते हैं। आज के दिन बहनें स्नान करके अपने घर में दीवारों पर सोन रखती हैं और फिर सेवइयों, चावल की खीर और मिठाई से इनकी पूजा करती है। सोनों (श्रवण­) के ऊपर खीर या मिठाई की सहायता से राखी के धागे चिपकाए जाते हैं। अगरबत्ती व धूप जलायी जाती है। तरह-तरह के स्वादिष्ट भोजन बनाती हैं।
धार्मिक मान्यता प्रातः शीघ्र उठकर बहनें स्नान के पश्चात् भाइयों को तिलक लगाती हैं तथा उसकी दाहिने कलाई पर राखी बाँधती हैं। इसके पश्चात् भाइयों को कुछ मीठा खिलाया जाता है। भाई अपनी बहन को भेंट देता है।
संबंधित लेख राखी, श्रावण, पूर्णिमा, भैया दूज
दिनांक 2017 सोमवार, 7 अगस्त
दिनांक 2018 रविवार, 26 अगस्त
अन्य जानकारी मुंबई में रक्षाबंधन पर्व को नारली (नारियल) पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। जल के देवता वरुण को प्रसन्न करने के लिए समुद्र को (नारियल) अर्पित किए जाते हैं। वरुणदेव ही पूजा के मुख्य देवता होते हैं।
अद्यतन‎

रक्षाबन्धन (अंग्रेज़ी: Raksha Bandhan) हिंदुओं का प्रमुख त्योहार है जो श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। यह भाई-बहन को स्नेह की डोर से बांधने वाला त्योहार है। यह त्योहार भाई-बहन के अटूट प्रेम का प्रतीक है।

रक्षाबंधन का अर्थ

रक्षाबंधन का अर्थ है (रक्षा+बंधन) अर्थात किसी को अपनी रक्षा के लिए बांध लेना। इसीलिए राखी बांधते समय बहन कहती है- 'भैया! मैं तुम्हारी शरण में हूँ, मेरी सब प्रकार से रक्षा करना।' आज के दिन बहन अपने भाई के हाथ में राखी बांधती है और उन्हें मिठाई खिलाती है। फलस्वरूप भाई भी अपनी बहन को रुपये या उपहार आदि देते हैं। रक्षाबंधन स्नेह का वह अमूल्य बंधन है जिसका बदला धन तो क्या सर्वस्व देकर भी नहीं चुकाया जा सकता।

रक्षासूत्र

भारतीय परम्परा में विश्वास का बन्धन ही मूल है और रक्षाबन्धन इसी विश्वास का बन्धन है। यह पर्व मात्र रक्षा-सूत्र के रूप में राखी बाँधकर रक्षा का वचन ही नहीं देता वरन् प्रेम, समर्पण, निष्ठा व संकल्प के जरिए हृदयों को बाँधने का भी वचन देता है। पहले रक्षाबन्धन बहन-भाई तक ही सीमित नहीं था, अपितु आपत्ति आने पर अपनी रक्षा के लिए अथवा किसी की आयु और आरोग्य की वृद्धि के लिये किसी को भी रक्षा-सूत्र (राखी) बांधा या भेजा जाता था। भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है कि- ‘मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव’- अर्थात ‘सूत्र’ अविच्छिन्नता का प्रतीक है, क्योंकि सूत्र (धागा) बिखरे हुए मोतियों को अपने में पिरोकर एक माला के रूप में एकाकार बनाता है। माला के सूत्र की तरह रक्षा-सूत्र (राखी) भी लोगों को जोड़ता है। गीता में ही लिखा गया है कि जब संसार में नैतिक मूल्यों में कमी आने लगती है, तब ज्योतिर्लिंगम भगवान शिव प्रजापति ब्रह्मा द्वारा धरती पर पवित्र धागे भेजते हैं, जिन्हें बहनें मंगलकामना करते हुए भाइयों को बाँधती हैं और भगवान शिव उन्हें नकारात्मक विचारों से दूर रखते हुए दु:ख और पीड़ा से निजात दिलाते हैं।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. मानवीय रिश्तों को एक धागे में बाँधता रक्षाबन्धन पर्व (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल)। । अभिगमन तिथि: 14 अगस्त, 2010
  2. देवद्विजातिशस्ता सुस्त्रीरर्घ्येः समर्चयेत् प्रथमम्। तदनु पुरोघा नृपतेः रक्षां वघ्नीत मन्त्रेण।। येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामभिबध्नामि रक्षा मा चल मा चल।। भिविष्योत्तर पुराण (137|19-20)।
  3. पुस्तक "धर्मकोश का इतिहास-भाग 4" से) पृष्ठ संख्या 52 पर
  4. Raksha Bandhan in History (English) (एच.टी.एम.एल) raksha-bandhan.com। अभिगमन तिथि: 14 अगस्त, 2010
  5. रानी कर्णावती (हिंदी) भारतकोश। अभिगमन तिथि: 17 जुलाई, 2014।
  6. Raksha Bandhan in History (English) (एच.टी.एम.एल) raksha-bandhan.com। अभिगमन तिथि: 14 अगस्त, 2010
  7. रक्षाबंधन से जुड़ी 5 रोचक बातें (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) तरकश। अभिगमन तिथि: 14 अगस्त, 2010

बाहरी कड़ियाँ

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