छठपूजा  

छठपूजा
छठपूजा,  अरुणाचल प्रदेश
अन्य नाम छठ पर्व
अनुयायी हिन्दू
प्रारम्भ पौराणिक काल
तिथि कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी
उत्सव सांध्य सूर्यपूजा के एक दिन पहले, श्रद्धालु शुद्धिकरण के लिए विशेषरूप से गंगा में डुबकी लगाते हैं तथा गंगा का पवित्र जल अर्पण हेतु घर साथ लाते हैं। पूरे दिन में उपवास रखा जाता है तथा श्रद्धालु देर शाम तक पूजा के बाद ही उपवास तोड़ते हैं।
अन्य जानकारी सूर्योपासना का यह अनुपम लोकपर्व मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है।

छठपूजा अथवा छठ पर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाने वाला एक हिन्दू पर्व है। सूर्योपासना का यह अनुपम लोकपर्व मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है। उत्तराखंड का 'उत्तरायण पर्व' हो या केरल का ओणम, कर्नाटक की 'रथसप्तमी' हो या बिहार का छठ पर्व, सभी इसका घोतक हैं कि भारत मूलत: सूर्य संस्कृति के उपासकों का देश है तथा बारह महीनों के तीज-त्योहार सूर्य के संवत्सर चक्र के अनुसार मनाए जाते हैं। छठ से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं और लोकगाथाओं पर गौर करे तो पता चलता है कि भारत के आदिकालीन सूर्यवंशी भरत राजाओं का यह मुख्य पर्व था। मगध[1]और आनर्त[2] के राजनीतिक इतिहास के साथ भी छठ की ऐतिहासिक कडियां जुड़ती हैं।

मान्यताएँ

  • इस संबंध में मान्यता है कि मगध सम्राट जरासंध के एक पूर्वज का कुष्ठ रोग दूर करने के लिए शाकलद्वीपीय मग ब्राह्मणों ने सूर्योंपासना की थी। तभी से यहाँ छठ पर सूर्योपासना का प्रचलन प्रारम्भ हुआ।
  • छठ के साथ आनर्त प्रदेश के सूर्यवंशी राजा शर्याति और भार्गव ऋषि च्यवन का भी ऐतिहासिक कथानक जुड़ा है। कहते हैं कि राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या ने कार्तिक की षष्ठी को सूर्य की उपासना की तो च्यवन ऋषि के आँखों की ज्योति वापस आ गई।
  • 'ब्रह्मवैवर्तपुराण' में छठ को स्वायम्भुव मनु के पुत्र प्रियव्रत के इतिहास से जोड़ते हुए बताया गया है कि षष्ठी देवी की कृपा से प्रियव्रत का मृत शिशु जीवित हो गया। तभी से प्रकृति का छठा अंश मानी जाने वाली षष्ठी देवी बालकों के रक्षिका और संतान देने वाली देवी के रूप में पूजी जाने लगी।
  • छठ के साथ स्कन्द पूजा की भी परम्परा जुड़ी है। भगवान शिव के तेज से उत्पन्न बालक स्कन्द की छह कृतिकाओं ने स्तनपान करा रक्षा की थी। इसी कारण स्कन्द के छह मुख हैं और उन्हें कार्तिकेय नाम से पुकारा जाने लगा।
  • कार्तिक से सम्बन्ध होने के कारण षष्ठी देवी को स्कन्द की पत्नी 'देवसेना' नाम से भी पूजा जाने लगा।
पुराण व उपनिषद में
  • श्वेताश्वतरोपनिषद में परमात्मा की माया को 'प्रकृति' और माया के स्वामी को 'मायी कहा गया है। यह प्रकृति ब्रह्मस्वरूपा, मायामयी और सनातनी है।
  • ब्रह्मवैवर्तपुराण प्रकृतिखण्ड के अनुसार परमात्मा ने सृष्टि के लिए योग का अवलम्बन कर अपने को दो भागों में बांटा। दक्षिण भाग से पुरुष व वाम भाग से प्रकृति का जन्म हुआ। 'प्रकृत' शब्द की व्याख्या कई प्रकार से की गयी।' प्र का अर्थ है प्रकृष्ट व 'कृति' का अर्थ है सृष्टि। यानी प्रकृष्ट सृष्टि। दूसरी व्याख्या के अनुसार 'प्र' का सत्वगुण, 'कृ' का रजोगुण और 'ति' का तमोगुण के रूप में अर्थ लिया गया है। इन्हीं तीनों गुणों की साम्यावस्था ही प्रकृति है।
  • पुराण के अनुसार सृष्टि की अधिष्ठात्री प्रकृति देवी स्वयं को पांच भागों में विभक्त करती हैं- दुर्गा, राधा, लक्ष्मी, सरस्वती और सावित्री। ये पांच देवियाँ पूर्णतम प्रकृति कहलाती हैं। इन्हीं प्रकृति देवी के अंश, कला, कलांश और कलांशाश भेद से अनेक रूप हैं, जो विश्व की समस्त स्त्रियों में दिखायी देते हैं।
  • मार्कण्डेयपुराण में लिखा है, स्त्रिय: समस्ता: सकल्ला जगत्सु'। प्रकृतिदेवी के एक प्रधान अंश को 'देवसेना' कहते हैं, जो सबसे श्रेष्ठ 'मातृका' मानी जाती हैं। ये समस्त लोकों के बालकों की रक्षिका देवी हैं। प्रकृति का छठा अंश होने के कारण इन देवी का एक नाम 'षष्ठी' भी है। षष्ठी देवी बालकों की रक्षिका एवं आयुप्रदा हैं।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. आज का बिहार
  2. आज का गुजरात

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