मकर संक्रांति  

मकर संक्रांति
मकर संक्रांति
अन्य नाम 'तिल संक्रांति', 'खिचड़ी पर्व'
अनुयायी हिन्दू धर्मावलम्बी
उद्देश्य मकर संक्रांति के दिन गंगा स्नान और तिल दान करने का विशेष महात्मय होता है।
प्रारम्भ पौराणिक
तिथि 14 जनवरी (वर्ष- 2019)
उत्सव यह दिन सुन्दर पतंगों को उड़ाने का दिन भी माना जाता है। लोग बड़े उत्साह से पतंगें उड़ाकर पतंगबाज़ी के दाँव–पेचों का आनन्द लेते हैं।
अनुष्ठान इस दिन कहीं खिचड़ी तो कहीं 'चूड़ादही'[1] का भोजन किया जाता है तथा तिल के लड्डू बनाये जाते हैं। ये लड्डू मित्र व सगे सम्बन्धियों में बाँटें भी जाते हैं।
धार्मिक मान्यता हिन्दू धर्म
संबंधित लेख पोंगल, लोहड़ी, माघबिहू
संक्रांति का अर्थ 'संक्रांति' का अर्थ है सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में जाना, अत: वह राशि जिसमें सूर्य प्रवेश करता है, संक्रांति की संज्ञा से विख्यात है।[2]
अन्य जानकारी मकर संक्रांति के दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण में प्रवेश कर जाता है। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने को 'उत्तरायण' कहते हैं।
अद्यतन‎

मकर संक्रान्ति (अंग्रेज़ी: Makar Sankranti) भारत के प्रमुख त्यौहारों में से एक है। यह पर्व प्रत्येक वर्ष जनवरी के महीने में समस्त भारत में मनाया जाता है। इस दिन से सूर्य उत्तरायण होता है, जब उत्तरी गोलार्ध सूर्य की ओर मुड़ जाता है। परम्परा से यह विश्वास किया जाता है कि इसी दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। यह वैदिक उत्सव है। इस दिन खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। गुड़–तिल, रेवड़ी, गजक का प्रसाद बाँटा जाता है। इस त्यौहार का सम्बन्ध प्रकृति, ऋतु परिवर्तन और कृषि से है। ये तीनों चीज़ें ही जीवन का आधार हैं। प्रकृति के कारक के तौर पर इस पर्व में सूर्य देव को पूजा जाता है, जिन्हें शास्त्रों में भौतिक एवं अभौतिक तत्वों की आत्मा कहा गया है। इन्हीं की स्थिति के अनुसार ऋतु परिवर्तन होता है और धरती अनाज उत्पन्न करती है, जिससे जीव समुदाय का भरण-पोषण होता है। यह एक अति महत्त्वपूर्ण धार्मिक कृत्य एवं उत्सव है। लगभग 80 वर्ष पूर्व उन दिनों के पंचांगों के अनुसार, यह 12वीं या 13वीं जनवरी को पड़ती थी, किंतु अब विषुवतों के अग्रगमन (अयनचलन) के कारण 13वीं या 14वीं जनवरी को पड़ा करती है।[3]वर्ष 2017 में मकर संक्रान्ति '14 जनवरी' को मनाई गई।

धर्म ग्रंथों में उल्लेख

मकर संक्रान्ति का उद्गम बहुत प्राचीन नहीं है। ईसा के कम से कम एक सहस्त्र वर्ष पूर्व ब्राह्मण एवं औपनिषदिक ग्रंथों में उत्तरायण के छ: मासों का उल्लेख है [4] में 'अयन' शब्द आया है, जिसका अर्थ है 'मार्ग' या 'स्थल। गृह्यसूत्रों में 'उदगयन' उत्तरायण का ही द्योतक है[5] जहाँ स्पष्ट रूप से उत्तरायण आदि कालों में संस्कारों के करने की विधि वर्णित है। किंतु प्राचीन श्रौत, गृह्य एवं धर्म सूत्रों में राशियों का उल्लेख नहीं है, उनमें केवल नक्षत्रों के संबंध में कालों का उल्लेख है। याज्ञवल्क्यस्मृति में भी राशियों का उल्लेख नहीं है, जैसा कि विश्वरूप की टीका से प्रकट है।[6] 'उदगयन' बहुत शताब्दियों पूर्व से शुभ काल माना जाता रहा है, अत: मकर संक्रान्ति, जिससे सूर्य की उत्तरायण गति आरम्भ होती है, राशियों के चलन के उपरान्त पवित्र दिन मानी जाने लगी। मकर संक्रान्ति पर तिल को इतनी महत्ता क्यों प्राप्त हुई, कहना कठिन है। सम्भवत: मकर संक्रान्ति के समय जाड़ा होने के कारण तिल जैसे पदार्थों का प्रयोग सम्भव है। ईसवी सन के आरम्भ काल से अधिक प्राचीन मकर संक्रान्ति नहीं है।[3]
रंगोली, मकर संक्रांति

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. बिहार राज्य का एक व्यंजन, जो चूड़ा चावल से बनाया जाता है।
  2. रवे: संक्रमणं राशौ संक्रान्तिरिति कथ्यते। स्नानदानतप:श्राद्धहोमादिषु महाफला।। नागरखंड (हेमाद्रि, काल, पृष्ठ 410); मेषादिषु द्वादशराशिषु क्रमेण सञ्चरत: सूर्यस्य पूर्वस्माद्राशेरुत्तरराशौ संक्रमणं प्रवेश: संक्रान्ति। अतस्तद्राशिनामपुर:सरं सा संक्रान्तिर्व्यपदिश्यते। काल निर्णय, पृष्ठ 331।
  3. 3.00 3.01 3.02 3.03 3.04 3.05 3.06 3.07 3.08 3.09 3.10 3.11 3.12 धर्मशास्त्र का इतिहास, चतुर्थ भाग |लेखक: डॉ. पाण्डुरंग वामन काणे |प्रकाशक: उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान |पृष्ठ संख्या: 79-84 |
  4. शतपथ ब्राह्मण, 2|1|3|1, 3 एवं 4; छान्दोग्योपनिषद, 4|15|5, एवं 5|10|1-2)। ऋग्वेद (3|33|7
  5. (आश्वलायन गृह्यसूत्र, 1|4|1-2; कौषीतकी गृह्य, 1|5; जै. 6|8|23; आपस्तम्भ गृह्यसूत्र 1|1|2)
  6. याज्ञवल्क्यस्मृति 1|80, सुस्थे इन्दौ
  7. रवे: संक्रमणं राशौ संक्रान्तिरिति कथ्यते। स्नानदानतप:श्राद्धहोमादिषु महाफला।। नागरखंड (हेमाद्रि, काल, पृष्ठ 410); मेषादिषु द्वादशराशिषु क्रमेण सञ्चरत: सूर्यस्य पूर्वस्माद्राशेरुत्तरराशौ संक्रमणं प्रवेश: संक्रान्ति। अतस्तद्राशिनामपुर:सरं सा संक्रान्तिर्व्यपदिश्यते। काल निर्णय, पृष्ठ 331।
  8. मत्स्यपुराण, अध्याय 98
  9. मत्स्यपुराण, 98|17
  10. संक्रान्त्यां पक्षयोरन्ते ग्रहणे चन्द्रसूर्ययो:। गंगास्नातो नर: कामाद् ब्रह्मण: सदनं व्रजेत्।। भविष्यपुराण (वर्ष क्रिया कौमदी., पृष्ठ 415)।
  11. (काल विवेक, पृष्ठ 380 काल निर्णय, पृष्ठ 333 आदि में उद्धृत
  12. (काल निर्णय, पृष्ठ 345)
  13. हेमाद्रि, काल, पृष्ठ 437
  14. काल निर्णय, पृष्ठ 345
  15. (काल निर्णय, पृष्ठ 333)
  16. इसमें अधिकतम पुण्यकाल 60 घटिकाओं का है
  17. जहाँ 16 घटिकाओं की इधर-उधर छूट है
  18. (काल, पृष्ठ 436-437)
  19. हेमाद्रि, काल, पृष्ठ 417, काल विवेक, पृष्ठ 382; कृत्यकल्पतरु., नैयतकाल, पृष्ठ 361-362 एवं 365
  20. कृत्यकल्पतरु., नैयतकाल, पृष्ठ 360; हेमाद्रि, काल, पृष्ठ 418; समय मयूख, पृष्ठ 167
  21. तिथितत्त्व, पृष्ठ 144-145
  22. धर्मसिंधु, पृष्ठ 2-3
  23. पृष्ठ 531
  24. पञ्चसिद्धान्तिका (3|23-24, पृष्ठ 9) ने परिभाषा दी है- 'मेषतुलादौ विषुवत् षडशीतिमुखं तुलादिभागेषु। षडशीतिमुखेषु रवे: पितृदिवसा येऽवशेषा: स्यु:।। षडशीतिमुखं कन्याचतुर्दशेऽष्टादशे च मिथुनस्य। मीनस्य द्वार्विशे षडविशे कार्मुकस्यांशे।। तुला आदिर्यस्या: सा तुलादि: कन्या। द्वादशैव भवन्त्येषां द्विज नामानि मे श्रृणु। एकं विष्णुपदं नाम षडशीतिमुखं तथा।। विषुवं च तृतीयं च अन्ये द्वे दक्षिणोत्तरे।। कुम्भालिगोहरिषु विष्णुपदं वदन्ति स्त्रीचापमीनमिथुने षडशीतिवक्त्रम्। अर्कस्य सौम्यमयनं शशिधाम्नि याम्यमृक्षे झषे विषुवति त्वजतौलिनो: स्यात्।। ब्रह्मवैवर्त (हेमाद्रि, काल, पृष्ठ 407) । कुछ शब्दों की व्याख्या आवश्यक है- अलि वृश्चिक, गो वृषभ, हरि सिंह, स्त्री कन्या, चाप धनु:, शशिधाम्नि शशिगृह कर्कटक, सौम्यायन उत्तरायण, याम्य दक्षिणायन (यम दक्षिण का अधिपति है), झष मकर, अज मेष, तौली (जो तराजू पकड़े रहता है) तुला।'
  25. देखिए बृहत्संहिता, 98|6-11; कृत्यकल्पतरु, नैयतकाल, पृष्ठ 361; हेमाद्रि, काल., पृष्ठ 409; काल निर्णय, पृष्ठ 341-342; समय मयूख, पृष्ठ 137। बृहत्संहिता 98|9 एवं कृत्यकल्पतरु, नैयत ने लघु दल में विभाजित का उल्लेख नहीं किया है
  26. (हेमाद्रि, काल, पृष्ठ 409-410 एवं वर्ष क्रिया कौमदी., पृष्ठ 210 जहाँ देवीपुराण की उक्तियाँ उद्धृत हैं)
  27. हेमाद्रि, काल, पृष्ठ 418-419; कृत्य रत्नाकर, पृष्ठ 614-165 एवं कृत्यकल्प, पृष्ठ 361-361
  28. मेष एवं तुला
  29. मकर एवं कर्कट संक्रान्ति
  30. पराशर (12|20; स्मृतिचंद्रिका 1, पृष्ठ 120)
  31. (हेमाद्रि, काल, पृष्ठ 433; काल निर्णय, पृष्ठ 339)
  32. (हेमाद्रि, काल, पृष्ठ 415-416, निर्णय सिंधु, पृष्ठ 218)
  33. (हेमाद्रि, काल, पृष्ठ 413; कृत्यकल्पतरु., नैयतकाल, पृष्ठ 366-367)
  34. स्कन्दे-धेनुं तिलमयीं राजन् दद्याद्यश्चोत्तरायणे। सर्वान् कामानवाप्नोति विन्दते परमं सुखम।। विष्णुधर्मोत्तरे-उत्तरे त्वयने विप्रा वस्त्रदनं महाफलम्। तिलपूर्वमनड्वाहं दत्त्व। रोगै: प्रमुच्यते।। शिवरहस्ये। पुरा मकरसंक्रान्तौ शंकरो गोसवे कृते। तिलानुत्पादयामास तृप्तये सर्वदेहिनाम्। तस्मात्तस्यां तिलै: स्नानं कार्य चोद्वर्तनं बुधै:। देवतानां विपृणां च सोदकैस्तर्पणं तिलै:। तिला देयाश्च विप्रेभ्य: सर्वदैवोत्तरायणे। तिलांश्च भक्षयेत्पुण्यान् होतव्याश्च तथा तिला:। तस्यां तथौ तिलैर्हुत्वा येऽर्चयन्ति द्विजोत्तमान्। त्रिदिवे ते विराजन्ते गोसहस्त्रप्रदायिन:। तिलतैलेन दीपाश्च देया: शिवगृहे शुभा:। सतिलैस्तण्डुलैर्देवं पूजयेद्विधिवद् द्विजम्।। हेमाद्रि (काल, पृष्ठ 415-416); निर्णय सिंधु (पृष्ठ 218)। गोसहस्त्र 16 महादानों में एक है। देखिए इस महाग्रंथ का खण्ड 2। 'त्रिदिवे ते विराजन्ते' के साथ मिलाइए ऋ. (10|107|2): 'उच्चा दिवि दक्षिणावन्तो अस्थुर्ये अश्वदा स्रह ते सूर्येण।'
  35. सूर्य के उत्तरायण या दक्षिणायन
  36. वृद्धवसिष्ठ, हेमाद्रि, काल, पृष्ठ 412; वर्ष क्रिया कौमदी., पृष्ठ 91
  37. वर्ष क्रिया कौमदी., पृष्ठ 214; काल विवेक, पृष्ठ 382
  38. आषाढ़, का कार्तिक, मा माघ, वै वैशाख
  39. विष्णु धर्म सूत्र, 3|319|38-45
  40. विष्णु धर्म सूत्र, 77|1-2
  41. विवाह, पुत्र जन्म के
  42. निर्णयसिंधु, पृष्ठ 6
  43. विष्णुपुराण, 3|11|118-119, कृत्य रत्नाकर, पृष्ठ 547 एवं वर्ष क्रिया कौमदी., पृष्ठ 216
  44. जहाँ का भोजन मल-मूत्र होता है
  45. (वर्ष क्रिया कौमदी, पृष्ठ 216)
  46. पितरों को
  47. तिलोद्वर्ती तिलस्नायी शचिर्नित्यं तिलोदकी। होता दाता च भोक्ता व षट्तिली नावसीदति।। शातातप।
  48. मकर संक्रांति आज या कल, ज्योतिषियों में भी एक राय नहीं (हिन्दी) (पी.एच.पी) नवभारत टाइम्स। अभिगमन तिथि: 15 जनवरी, 2012।
  49. 49.0 49.1 मकर संक्रांति खान-पान (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 12 जनवरी, 2013।

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