कृष्णाष्टमी  

श्रीकृष्ण का जन्म उत्सव मनाते हुए।

कृष्णाष्टमी हिंदुओं का एक पवित्र पर्व है, जो भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के उत्सव स्वरूप मनाया जाता है। श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्णाष्टमी बुधवार को रोहिणी नक्षत्र में अर्धरात्रि के समय वृष के चंद्रमा में हुआ था।[1]

अष्टमी के प्रकार

जन्माष्टमी के काल निर्णय के विषय में पर्याप्त मतभेद दृष्टिगोचर होता है। अत: उपासक अपने मनोनुकूल अभीष्ट योग का ग्रहण करते हैं। शुद्धा और बिद्धा, इसके दो भेद धर्मशास्त्र में बतलाए गए हैं। सूर्योदय से लेकर दूसरे दिन सूर्योदय पर्यंत यदि अष्टमी तिथि रहती है, तो वह 'शुद्धा' मानी जाती है। सप्तमी या नवमी से संयुक्त होने पर वह अष्टमी 'बिद्धा' कही जाती है। शुद्धा या बिद्धा भी समा, न्यूना या अधिका के भेद से तीन प्रकार की है। इन भेदों में तत्काल व्यापिनी (अर्धरात्रि में रहने वाली) तिथि अधिक मान्य होती है। कृष्ण का जन्म अष्टमी की अर्धरात्रि में हुआ था; इसीलिये लोग उस काल के ऊपर अधिक आग्रह रखते हैं। वह यदि दो दिन हो या दोनों ही दिन न हो, तो सप्तमीबिद्धा को सर्वथा छोड़कर नवमीबिद्धा का ही ग्रहण मान्य होता है। कतिपय वैष्णव रोहिणी नक्षत्र होने पर ही जन्माष्टमी का व्रत रखते हैं।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 कृष्णाष्टमी (हिंदी) भारतखोज। अभिगमन तिथि: 01 अगस्त, 2015।

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