ईद उल ज़ुहा  

ईद उल ज़ुहा
ईद पर नमाज़ पढ़ते लोग
अन्य नाम बकरीद
अनुयायी मुस्लिम, भारतीय
उद्देश्य इस दिन मुसलमान किसी पाक साफ़ जगह पर जिसे 'ईदगाह' कहते हैं, वहाँ इकट्ठे होकर दो रक्आत नमाज़ शुक्राने की अदा करते हैं।
तिथि हिजरी) के आख़िरी महीने अर्थात् ज़िलहिज्ज की 10 तारीख़
धार्मिक मान्यता ईद के दौरान बढ़िया खाने के अतिरिक्त, नए कपड़े भी पहने जाते हैं और परिवार और दोस्तों के बीच तोहफ़ों का आदान-प्रदान होता है।
संबंधित लेख ईद उल फ़ितर, मोहर्रम, नमाज़, ईद उल फ़ितर -नज़ीर अकबराबादी
क़ुर्बानी का महत्त्व इन्सान ईश्वर या अल्लाह से असीम लगाव व प्रेम का इज़हार करे और उसके प्रेम को दुनिया की वस्तु या इन्सान से ऊपर रखे। इसके लिए वह अपनी प्रिय से प्रिय वस्तु को क़ुर्बान करने की भावना रखे।

ईद उल ज़ुहा अथवा ईद-उल-अज़हा इस्लामी कैलेण्डर (हिजरी) के आख़िरी महीने अर्थात् ज़िलहिज्ज की 10 तारीख़ को मनाई जाती है। ईद उल ज़ुहा को 'बकरीद' भी कहा जाता है। ईद-उल-फ़ितर की तरह ही इस दिन भी मुसलमान ईदग़ाह जाकर ईद की नमाज़ अदा करते हैं और सब लोगों से गले मिलते हैं। इसके बाद किसी हलाल जानवर ऊँट, भेड़, बकरा आदि की क़ुर्बानी देते हैं। इसी अवसर पर पवित्र शहर मक्का में हज़रत इब्राहीम, हज़रत इस्माईल और हज़रत इब्राहीम की पत्नी व हज़रत इस्माईल की माँ हज़रत हाज़रा की सुन्नतों को अदा करते हैं। हज़ का मुख्य कार्यक्रम ज़िलहिज्ज की 8 तारीख़ से शुरू होकर पाँच दिन अर्थात् 12 ज़िलहिज्ज तक चलता है, जिसमें 10 ज़िलहिज्ज को क़ुर्बानी भी शामिल है।

आदिकाल से ही जब ईश्वर ने इस सृष्टि की रचना की तो इन्सान को सही जीवन जीने के लिए अपने पसंदीदा बंदों या नबियों के द्वारा ऐसा संविधान और जीवन दर्शन भी भेजा, जो मानव समाज को क़ुर्बानी अर्थात् बलिदान का महत्त्व समझा सके और उसमें यह भावना भी पैदा कर सके। इस संविधान के आदम से लेकर तमाम नबी अपने साथ लाये। इस संविधान या जीवन दर्शन में अन्य बातों के अलावा इन्सान को अपने अहंकार व अपनी प्रिय वस्तुओं को अल्लाह की राह में और उसकी इच्छा के लिए क़ुर्बान करने की भी शिक्षा दी गई।

मान्यता

ईद-अल-अज़हा या ईद-ए-क़ुर्बां एक बड़ी क़ुर्बानी की यादगार के रूप में मनाई जाती है। हज़रत इब्राहीम एक पैग़म्बर थे। उन्हें अल्लाह का आदेश हुआ कि अपने प्रिय पुत्र इस्माईल को हमारी राह में क़ुर्बान कर दो। इब्राहीम ने अपने बेटे इस्माईल को इस बारे में बताया तो उन्होंने भी ख़ुदा की बन्दग़ी के सामने सर झुकाते हुए पिता इब्राहीम को इस पर सहमति दे दी। हज़रत इब्राहीम इस्माईल को मीना के मैदान में ले गये। बेटे को ज़मीन पर लिटाया, अपनी आँखों पर पट्टी बाँधी, ताकि प्रिय बेटे के क़ुर्बान होने का मंज़र न देख सके और बेटे की गर्दन पर छुरी फेर दी। इस बात का उल्लेख क़ुरआन ने इन शब्दों में किया है कि इब्राहीम ने इस्माईल के होशियार होने के बाद उन्हें राहे ख़ुदा में क़ुर्बान करने के लिए उनके गले पर छुरी फेर दी। लेकिन अल्लाह को इब्राहीम के बन्दग़ी की यह अदा इतनी पंसद आई कि इस्माईल को उस जगह से हटाकर स्वर्ग से एक दुम्बा (भेड़) को उसके स्थान पर भेज दिया गया और इस्माईल को बचा लिया गया। केवल यही नहीं इब्राहीम की इस क़ुर्बानी को महत्त्व दिया गया कि हर साल इस दिन किसी जानवर की क़ुर्बानी को तमाम लोगों पर फ़र्ज़ ठहरा कर इसे एक इबादत का दर्जा दे दिया गया। यही नहीं बल्कि जिस जगह अर्थात् मीना के मैदान में यह क़ुर्बानी दी गई, उस मैदान को भी इस तरह यादगार बना दिया गया कि हर वर्ष हज के अवसर पर हाज़ी वहाँ पर उपस्थित होकर क़ुर्बानी व हज़रत इब्राहीम के द्वारा क़ुर्बानी के दौरान अपनाये गये कुछ अमल (मानसिक) को अदा करते हैं।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. सूरए हज आयत 37

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