संजा पर्व  

संजा पर्व भाद्रपद माह के शुक्ल पूर्णिमा से पितृमोक्ष अमावस्या तक पितृपक्ष में कुंआरी कन्याओं द्वारा मनाया जाने वाला पर्व है। यह पर्व मुख्य रूप से मालवा-निमाड़, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र आदि में मनाया जाता है। संजा पर्व में श्राद्ध के सोलह ही दिन[1] कुंवारी कन्याएँ शाम के समय एक स्थान पर एकत्रित होकर गोबर के मांडने मांडती हैं और संजा के गीत गाती हैं व संजा की आरती कर प्रसाद बांटती हैं। सोलह ही दिन तक कुंवारी कन्याएँ गोबर के अलग-अलग मांडने मांडती है तथा हर दिन का एक अलग गीत भी होता है।

संजा का निर्माण

गणेश विसर्जन के दूसरे दिन यानी पूनम को मालवा, निमाड़ और राजस्थान की किशोरियों की सखी-सहेली संजा मायके पधारती हैं। 'संजा' यानी स्मृतियों और आगत के अद्भुत संगम का पर्व। एक ओर पुरखों की यादें तो दूसरी ओर किशोरियों के मन में विवाह की कामना। योग्य वर की चाहत रखने वाली कुँवारी किशोरियाँ सृजन और विसर्जन के इस पर्व को पितृपक्ष के सोलह दिनों तक बड़े चाव से मनाती हैं। संजा की सोलह पारंपरिक आकृतियाँ गोबर, फूल, पत्ती और पन्नियों से बनती हैं। संजा के दिनों में ताजे हरे गोबर को ढूँढने में बड़ी कठिनाई होती है, पर जैसे ही गोबर मिल जाता है प्रसन्नचित लड़कियों की खोजी निगाहें ढूँढती हैं, चाँदनी के दूधिया-सफेद, कनेर के पीले, गुलाबी और देसी लाल रंग के गुलाब के फूलों को। संजा के नाम पर कभी माँगकर, तो कभी चुराकर लाए गए फूलों और गोबर के मिलने पर असली कार्य शुरू होता है। घर की बाहरी दीवार के किसी कोने में पानी छिड़ककर छोटे-से हिस्से को गोबर से लीपा जाता है और इस पर पूनम को पाटलों, बीज को बीजारू, छठ की छाबड़ी, सतमी को सांतियो से लेकर अमावस्या तक के सोलह दिनों में पारंपरिक आकृतियाँ बनाई जाती हैं। अंतिम दिन बनता है- 'किलाकोट'।

गान

गोबर से उकेरी और फूलों से सजी आकृतियों को देखकर लड़कियाँ किसी कलाकार की तरह प्रसन्न होती हैं। उनके सुमधुर कंठों से संजा के गीत फूट पड़ते हैं। घेरदार घाघरा और गुलाबदार साड़ी पहनने वाली, गहनों से सजी, खीर-पूड़ी खाने की शौकीन, नाजुक सलोनी संजा कल्पना में तैरती है। संजा को पूजती किशोरियाँ 'पेली आरती राई रमझोर' का जैसे ही अलाप लेती हैं तो पहले से ही चौकस बैठी लड़कियाँ घर से भाग छूटती हैं। इसके साथ ही समवेत गान शुरू हो जाता है-

'छोटी-सी गाड़ी गुड़कती जाए, गुड़कती जाए,
जी में बैठ्या संजा बाई, घाघरो धमकाता जाए,
चूड़लो छमकाता जाए,
बई जी की नथड़ी झोला खाए,
बताई दो वीरा पीयर जाए।'

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक
  2. जीवन को अभिव्यक्त करता संजा पर्व (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 16 अगस्त, 2013।
  3. भित्ति चित्र परम्परा संजा (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 16 अगस्त, 2013।

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