दोलोत्सव  

दोलोत्सव मुख्यत: वैष्णव संप्रदायों के मंदिरों में मनाया जाने वाला प्रमुख उत्सव है। वैसे तो समस्त भारत में इस उत्सव का प्रचलन है, किंतु उत्तर प्रदेश में मथुरा के वृन्दावन और बंगाल में यह विशेष समारोह के रूप में मनाया जाता है। बंगाल में इसे 'दोलयात्रा' कहते हैं। आजकल यह उत्सव प्रतिपदा से युक्त फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा तथा चैत्र शुक्ल द्वादशी को मनाया जाता है।

पौराणिक उल्लेख

  • पद्म पुराण[1] में आया है कि कलियुग में फाल्गुन चतुर्दशी पर आठवें प्रहर में या पूर्णिमा तथा प्रथमा के योग पर दोलोत्सव तीन दिनों या पाँच दिनों तक किया जाता है। पालने में झूलते हुए कृष्ण को दक्षिणामुख होकर एक बार देख लेने से पापों के भार से मुक्ति मिल जाती है। पद्म पुराण[2] में विष्णु का दोलोत्सव भी वर्णित है।
  • चैत्र शुक्ल तृतीया पर गौरी का तथा पुरुषचिन्तामणि[3], व्रतराज[4] राम का दोलोत्सव[5] होता है। कृष्ण का दोलोत्सव चैत्र शुक्ल एकादशी[6] पर होता है। गायत्री के समान मन्त्र यह है-
'ओं दोलारूढाय विद्महे माधवाय च धीमहि। तन्नो देवः प्रचोदयात्।।'

आज भी मथुरा-वृन्दावन, अयोध्या, द्वारका, डाकोर आदि में कृष्ण का दोलोत्सव मनाया जाता है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. पद्म पुराण 4|80|45-50
  2. पद्म पुराण 6|85
  3. पुरुषचिन्तामणि 85
  4. व्रतराज 84
  5. समयमयूख 35
  6. पद्मपुराण 6|85
  7. दोलोत्सव (हिन्दी) भारतखोज। अभिगमन तिथि: 25 सितम्बर, 2015।
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