श्वेताश्वतरोपनिषद  

कृष्ण यजुर्वेद शाखा के इस उपनिषद में छह अध्याय हैं। इनमें जगत का मूल कारण, ॐकार-साधना, परमात्मतत्त्व से साक्षात्कार, ध्यानयोग, योग-साधना, जगत की उत्पत्ति, संचालन और विलय का कारण, विद्या-अविद्या, जीव की नाना योनियों से मुक्ति के उपाय, ज्ञानयोग और परमात्मा की सर्वव्यापकता का वर्णन किया गया है।

प्रथम अध्याय

  • इस अध्याय में जगत के मूल कारण को जानने के प्रति जिज्ञासा अभिव्यक्त की गयी है। साथ ही 'ॐकार' की साधना द्वारा 'परमात्मतत्त्व' से साक्षात्कार किया गया है। काल, स्वभाव, सुनिश्चित कर्मफल, आकस्मिक घटना, पंचमहाभूत और जीवात्मा, ये इस जगत के कारणभूत तत्त्व हैं या नहीं, इन पर विचार किया गया है। ये सभी इस जगत के कारण इसलिए नहीं हो सकते; क्योंकि ये सभी आत्मा के अधीन हैं। आत्मा को भी कारण नहीं कहा जा सकता; क्योंकि वह सभी सुख-दु:ख के कारणभूत कर्मफल-व्यवस्था के अधीन है।
  • केवल बौद्धिक विवेचन से 'ब्रह्म' को बोध सम्भव नहीं है। ध्यान के अन्तर्गत आत्मचेतन द्वारा ही गुणों के आवरण को भेदकर उस परमतत्त्व का अनुभव किया जा सकता है।
  • सम्पूर्ण विश्व-व्यवस्था एक प्रकृति-चक्र के मध्य घूमती दिखाई देती है, जिसमें सत्व, रज, तम गुणों के तीन वृत्त हैं, पाप-पुण्य दो कर्म हैं, जो मोह-रूपी नाभि को केन्द्र मानकर घूमते रहते हैं। इस ब्रह्मचन्द्र' में जीव भ्रमण करता रहता है। इस चक्र से छूटने पर ही वह 'मोक्ष' को प्राप्त कर पाता है। उस परमात्मा को जान लेने पर ही इस चक्र से मुक्ति मिल जाती है।
  • वह 'परमतत्त्व' प्रत्येक जीव में स्थित है। मनुष्य अपने विवेक से ही उसे जान पाता है। वह जीव और जड़ प्रकृति के परे परमात्मा है, ब्रह्म है।'ओंकार' की साधना से जीवात्मा, परमात्मा से संयोग कर पाता है। जिस प्रकार तिलों में तेल, दही में घी, काष्ठ में अग्नि, स्रोत में जल छिपा रहता है, उसी प्रकार परमात्मा अन्त:करण में छिपा रहता है। 'आत्मा' में ही 'परमतत्त्व' विद्यमान रहता है।

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