यज्ञ  

यज्ञ
यज्ञ करते लोग
विवरण 'यज्ञ' से तात्पर्य है- 'त्याग, बलिदान, शुभ कर्म'। अपने प्रिय खाद्य पदार्थों एवं मूल्यवान सुगंधित पौष्टिक द्रव्यों को अग्नि एवं वायु के माध्यम से समस्त संसार के कल्याण के लिए यज्ञ द्वारा वितरित करना।
धर्म हिन्दू धर्म
यज्ञ के अंग 'स्नान', 'दान', 'होम' तथा 'जप'।
प्रकार लोक, क्रिया, सनातन गृह, पंचभूत तथा मनुष्य।
गृहस्थ धर्म के यज्ञ ब्रह्म-यज्ञ, देव-यज्ञ, पितृ-यज्ञ, भूत-यज्ञ, मनुष्य-यज्ञ।
विशेष जिस प्रकार देवताओं में विष्णु, वैष्णव पुरुषों में शिव, शास्त्रों में वेद, तीर्थों में गंगा, व्रतों में एकादशी, पुष्पों में तुलसी, नक्षत्रों में चन्द्रमा, पक्षियों में गरुड़, स्त्रियों में भगवती मूल प्रकृति राधा को सर्वोपरी माना जाता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण यज्ञों में 'विष्णु यज्ञ' श्रेष्ठ माना जाता है।
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अन्य जानकारी वैदिक यज्ञों में 'अश्वमेध यज्ञ' का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह महाक्रतुओं में से एक है। 'महाभारत' में महाराज युधिष्ठिर द्वारा कौरवौं पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् पाप मोचनार्थ किये गये अश्वमेध यज्ञ का विशद वर्णन है।

यज्ञ संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है- "आहुति, चढ़ावा"। यह हिंदू धर्म में प्राचीन भारत के आरंभिक ग्रंथों वेदों में निर्धारित अनुष्ठानों पर आधारित उपासना पद्धति है। यह उपासना उस पूजा के विपरीत है, जिसमें अवैदिक मूर्तिपूजा एवं भक्ति प्रथाएँ शामिल हो सकती हैं। यज्ञ हमेशा उद्देश्यपूर्ण होता है। यहाँ तक कि इसका लक्ष्य ब्रह्मांड की स्वाभाविक व्यवस्था क़ायम रखने जैसा व्यापक भी हो सकता है। इसमें अनुष्ठानों का सही निष्पादन और मंत्रों का शुद्ध उच्चारण अनिवार्य माने जाते हैं तथा निष्पादक और प्रयुक्त सामग्री का अत्यधिक पवित्र होना आवश्यक है। ऐसी आनुष्ठानिक आवश्यकताओं ने पुरोहितों के व्यावसायिक वर्ग, आधुनिक ब्राह्मणों को जन्म दिया, जिनकी अब भी महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक यज्ञ कराने में आवश्यकता पड़ती है। कई रूढ़िवादी हिन्दू परिवार पाँच दैनिक घरेलू आहुतियाँ और महायज्ञ अब भी करते हैं।

यज्ञ के अंग तथा प्रकार

यज्ञ के चार अंग माने गए हैं- 'स्नान', 'दान', 'होम' तथा 'जप'। इसके पाँच प्रकार बताये गए हैं-

  1. लोक
  2. क्रिया
  3. सनातन गृह
  4. पंचभूत
  5. मनुष्य

तात्पर्य

यज्ञ से तात्पर्य है- 'त्याग, बलिदान, शुभ कर्म'। अपने प्रिय खाद्य पदार्थों एवं मूल्यवान सुगंधित पौष्टिक द्रव्यों को अग्नि एवं वायु के माध्यम से समस्त संसार के कल्याण के लिए यज्ञ द्वारा वितरित किया जाता है। वायु शोधन से सबको आरोग्यवर्धक साँस लेने का अवसर मिलता है। हवन हुए पदार्थ वायुभूत होकर प्राणिमात्र को प्राप्त होते हैं और उनके स्वास्थ्यवर्धन, रोग निवारण में सहायक होते हैं। यज्ञ काल में उच्चरित वेद मंत्रों की पुनीत शब्द ध्वनि आकाश में व्याप्त होकर लोगों के अंतःकरण को सात्विक एवं शुद्ध बनाती है। इस प्रकार थोड़े ही खर्च एवं प्रयत्न से यज्ञकर्ताओं द्वारा संसार की बड़ी सेवा बन पड़ती है। वैयक्तिक उन्नति और सामाजिक प्रगति का सारा आधार सहकारिता, त्याग, परोपकार आदि प्रवृत्तियों पर निर्भर है। यदि माता अपने रक्त-मांस में से एक भाग नये शिशु का निर्माण करने के लिए न त्यागे, प्रसव की वेदना न सहे, अपना शरीर निचोड़कर उसे दूध न पिलाए, पालन-पोषण में कष्ट न उठाए और यह सब कुछ नितान्त निःस्वार्थ भाव से न करे, तो फिर मनुष्य का जीवन-धारण कर सकना भी संभव न हो। इसलिए कहा जाता है कि मनुष्य का जन्म यज्ञ भावना के द्वारा या उसके कारण ही संभव होता है। गीताकार ने इसी तथ्य को इस प्रकार कहा है कि प्रजापति ने यज्ञ को मनुष्य के साथ जुड़वा भाई की तरह पैदा किया और यह व्यवस्था की, कि एक दूसरे का अभिवर्धन करते हुए दोनों फलें-फूलें।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. ऐतरेय ब्राह्मण 8.20
  2. वैदिक जगत् डॉट कॉम (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल)। । अभिगमन तिथि: 2 अक्टूबर, 2010।
  3. -19.70, 10.11
  4. -य॰गा॰
  5. शतपथ ब्राह्मण 13.1-5
  6. तैत्तिरीय ब्राह्मण 3.8-1
  7. कात्यायनीय श्रोतसूत्र 20
  8. आपस्तम्ब 20
  9. आश्वलायन 10.6
  10. शंखायन 16
  11. महाभारत 10.71.14

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