अमावास्या  

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अमावास्या
अमावस्या तिथि पर चन्द्रमा
विवरण पंचांग के अनुसार 'अमावस्या' माह की 30वीं तथा कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि है। जिस तिथि में चन्द्रमा और सूर्य साथ रहते हैं, वही 'अमावास्या' तिथि है।
अन्य नाम अमावसी, 'सिनीवाली', 'दर्श'
दिशा ईशान
विशेष हिन्दू धर्म में प्रत्येक माह की अमावस्या तिथि पर कोई न कोई पर्व अवश्य मनाया जाता है।
संबंधित लेख चन्द्रमा, सूर्य, माह
अन्य जानकारी 'अमावास्या' पर सूर्य और चन्द्रमा का अन्तर शून्य हो जाता है। इस तिथि को क्रय-विक्रय तथा समस्त शुभ कर्मों का निषेध है। अमावस्या तिथि पर चन्द्रमा का औषधियों में वास रहता है।

अमावस्या की तिथि का हिन्दू धर्म में बड़ा ही महत्त्व बताया गया है। जिस तिथि में चन्द्रमा और सूर्य साथ रहते हैं, वही 'अमावास्या' तिथि है। इसे 'अमावसी' भी कहा जाता है। इसके साथ ही 'सिनीवाली' या 'दर्श' नाम भी प्राप्त होते हैं। अमावास्या माह की तीसवीं तिथि होती है। कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को कृष्ण पक्ष प्रारम्भ होता है तथा अमावास्या का समाप्त होता है। अमावास्या पर सूर्य और चन्द्रमा का अन्तर शून्य हो जाता है।

नामकरण

अमावस्या के नामकरण हेतु 'मत्स्य पुराण' के 14वें अध्याय में एक रूपक कथा आती है, जिसके अनुसार- प्राचीन काल में पितरों ने 'आच्छोद' नामक एक सरोवर का निर्माण किया था। इन देव पितरों की एक मानसी कन्या थी, जिसका नाम था 'अच्छोदा'। अच्छोदा ने एक बार एक सहस्त्र दिव्य वर्षों तक कठिन तप किया। अतः उसे वर देने के लिये पितरगण पधारे। उनमें से एक अतिशय सुन्दर 'अमावसु' नामक पितर को देखकर 'अच्छोदा' उन पर अनुरक्त हो गई और अमावसु से प्रणय याचना करने लगी। किन्तु अमावसु इसके लिये तैयार नहीं हुये। अमावसु के धैर्य के कारण उस दिन की तिथि पितरों को अतिशय प्रिय हुई। उस दिन कृष्ण पक्ष की पंचदशी तिथि थी, जो कि तभी से 'अमावसु' के नाम पर 'अमावस्या' कहलाने लगी।

तिथामवसुर्यस्यामिच्छां चक्रे न तां प्रति।
धैर्येण तस्य सा लोकैः अमावस्येति विश्रुता।
पितृणां वल्लभा मस्मात्तस्यामक्षयकारकम्।।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. अमावस्या का व्रत (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 19 सितम्बर, 2013।
  2. जाने पितृपक्ष का महत्त्व (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 19 सितम्बर, 2013।
  3. हेमाद्रि (काल पर चतुर्वर्ग-चिन्तामणि, पृ0 311-315; 643-44), कालविवेक (343-44), तिथितत्त्व (163), गोभिल-गृह्य (1|5|5) का भाष्य, पुरुषार्थ-चिन्तामणि (314-345)
  4. हेमाद्रि व्रतखण्ड (2, 246-257), माधवकृत कालनिर्णय (309) एवं व्रतार्क (334-356
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