युधिष्ठिर  

संक्षिप्त परिचय
युधिष्ठिर
Yudhishthir-Birla-mandir.jpg
अन्य नाम धर्मराज
अवतार यम का अंशावतार
वंश-गोत्र चंद्रवंश
कुल यदुकुल
पिता पाण्डु
माता कुन्ती, माद्री(विमाता)
जन्म विवरण कुन्ती द्वारा यम(धर्मराज) का आवाहन करने से प्राप्त पुत्र युधिष्ठिर
समय-काल महाभारत काल
परिजन भाई भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, कर्ण पत्नी द्रौपदी और देविका और पुत्र धौधेय, प्रतिविंध्य
गुरु द्रोणाचार्य
विवाह द्रौपदी और देविका
संतान द्रौपदी से प्रतिविंध्य और देविका से धौधेय
विद्या पारंगत भाला चलाने में निपुण
महाजनपद कुरु
शासन-राज्य हस्तिनापुर, इन्द्रप्रस्थ
संदर्भ ग्रंथ महाभारत
मृत्यु सशरीर स्वर्गारोहण
संबंधित लेख महाभारत

युधिष्ठिर पाण्डु के पुत्र और पांच पाण्डवों में से सबसे बड़े भाई थे। महाभारत के नायकों में समुज्ज्वल चरित्र वाले ज्येष्ठ पाण्डव थे। युधिष्ठिर धर्मराज के पुत्र थे। वे सत्यवादिता एवं धार्मिक आचरण के लिए विख्यात हैं। अनेकानेक धर्म सम्बन्धी प्रश्न एवं उनके उत्तर युधिष्ठिर के मुख से महाभारत में कहलाये गये हैं। शान्तिपर्व में सम्पूर्ण समाजनीति, राजनीति तथा धर्मनीति युधिष्ठिर और भीष्म के संवाद के रूप में प्रस्तुत की गयी है। युधिष्ठिर भाला चलाने में निपुण थे। वे कभी मिथ्या नहीं बोलते थे। उनके पिता ने यक्ष बन कर सरोवर पर उनकी परीक्षा भी ली थी। महाभारत युद्ध में धर्मराज युधिष्ठिर सात अक्षौहिणी सेना के स्वामी होकर कौरवों के साथ युद्ध करने को तैयार हुए थे, जबकि परम क्रोधी दुर्योधन ग्यारह अक्षौहिणी सेना का स्वामी था।

जीवन परिचय

इनका जन्म धर्मराज के संयोग से कुंती के गर्भ द्वारा हुआ था। वयस्क होने पर इन्होंने कौरवों के साथ द्रोणाचार्य से धनुर्वेद सीखा। समय आने पर जब इनको युवराज-पद मिला तब इन्होंने अद्भुत धैर्य, दृढ़ता, सहनशीलता, नम्रता, दयालुता और प्राणिमात्र पर कृपा आदि गुणों का परिचय देते हुए प्रजा का पालन उत्तम रीति से किया। इसके पश्चात् दुर्योधन आदि के षड्यंत्र से ये अपने भाइयों और माता समेत वारणावत भेज दिये गये। वहाँ पर ये जिस भवन में ठहराये गये थे। वह भड़क उठने वाली वस्तुओं से बनाया गया था, अतएव उससे निकल भागने को इन्होंने गुप्त रीति से सुरंग खुदवाई और भवन में पुरोचन के आग लगाकर उस सुरंग की राह निकल भागे। फिर ये लोग व्यासजी के सलाह से एकचक्रा नगरी में जाकर रहने लगे। यह नगरी इटावा से 16 मील दक्षिण-पश्चिम में है। यहाँ रहते समय भीमसेन ने बक राक्षस को मारा था। यहाँ से दूसरे स्थान को जाते समय रास्ते में अंगारपर्ण गन्धर्वराज के साथ अर्जुन की मुठभेड़ हुई थी। अन्त में युधिष्ठिर की कृपा से, अंगारपर्ण को छुटकारा मिला था।

उत्कोचक तीर्थ में पहुँचने पर पाण्डवों ने धौम्य मुनि को अपना पुरोहित बनाया। फिर ये लोग द्रुपद राजा की स्वयंवर-सभा में पहुँचे। वहाँ अर्जुन के लक्ष्यभेद करने पर द्रौपदी की प्राप्ति हुई। कुंती ने भिक्षा में मिली हुई वस्तु को देखे बिना ही आज्ञा दे कि पाँचों भाई बाँट लो। अंत में सब हाल मालूम होने पर कुंती बड़े असमंजस में पड़ीं। तब युधिष्ठिर ने कहा कि माता के मुँह से जो बात निकल गई है उसी को हम लोग मानेंगे। विवाह हो चुकने पर पाण्डव लोग दुबारा हस्तिनापुर पहुँच गये। सदा धर्म के मार्ग पर चलने वाले धर्मराज युधिष्ठिर ने राजा शैव्य की पुत्री देविका को स्वयंवर में प्राप्त किया और उनसे विवाह किया था। पाण्डवों को खाण्डवप्रस्थ हिस्से में मिला। वहीं राजधानी बनाकर वे निवास करने लगे।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. महाभारत, सभापर्व, 46,80
  2. महाभारत, भीष्मवधपर्व, ।992, द्रोणपर्व, 162, 183, 190, स्त्रीपर्व, 26, 27, शांतिपर्व, राजधर्मानुशासनपर्व

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