मय दानव  

मय दानव का उल्लेख महाभारत में खाण्डव वन दहन के प्रसंग में हुआ है। उसे देवताओं का शिल्पकार भी कहा गया है। मत्स्यपुराण में अठारह वास्तुशिल्पियों के नाम दिए गए हैं, जिनमें विश्वकर्मा और मय दानव का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। मय दानव बड़ा होशियार शिल्पकार था। अर्जुन द्वारा जीवन दान दिये जाने के कारण उसकी अर्जुन से मित्रता हो गई थी। अर्जुन के कहने से ही मय दानव ने युधिष्ठिर के लिए राजधानी इन्द्रप्रस्थ में बड़ा सुन्दर सभा भवन बनाया था।

अर्जुन से मित्रता

खाण्डव वन के दहन के समय अर्जुन ने मय दानव को अभय दान दे दिया था। इससे कृतज्ञ होकर मय दानव ने अर्जुन से कहा- "हे कुन्तीनन्दन! आपने मेरे प्राणों की रक्षा की है, अतः आप आज्ञा दें, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?" अर्जुन ने उत्तर दिया- "मैं किसी बदले की भावना से उपकार नहीं करता, किन्तु यदि तुम्हारे अन्दर सेवा भावना है तो तुम श्रीकृष्ण की सेवा करो।" मयासुर के द्वारा किसी प्रकार की सेवा की आज्ञा माँगने पर श्रीकृष्ण ने उससे कहा- "हे दैत्यश्रेष्ठ! तुम युधिष्ठिर की सभा हेतु ऐसे भवन का निर्माण करो, जैसा कि इस पृथ्वी पर अभी तक न निर्मित हुआ हो।"

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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