भूरिश्रवा  

भूरिश्रवा सोमदत्त का पुत्र था। महाभारत के युद्ध में भूरिश्रवा की सात्यकि के साथ अनेक बार मुठभेड़ हुई थीं। युद्ध के पांचवें दिन भूरिश्रवा ने सात्यकि के दस पुत्रों को मार डाला। युद्ध के चौदहवें दिन जयद्रथ को मारने के लिए गये हुए अर्जुन को ढूँढता हुआ तथा कौरवों की सेना में उथल-पुथल मचाता हुआ सात्यकि, भूरिश्रवा से पुन: जूझने लगा था। सात्यकि का रथ खण्डित हो गया था। वह मल्ल युद्ध में व्यस्त था। सात्यकि प्रात:काल से युद्ध करने के कारण बहुत थक गया था। भूरिश्रवा ने उसे उठाकर धरती पर पटक दिया तथा उसकी चोटी को पकड़कर तलवार निकाल ली।

अर्जुन का वार

जिस समय भूरिश्रवा सात्यकि का वध करने वाला था, तभी अर्जुन ने कृष्ण की प्रेरणा से भूरिश्रवा की बांह पर ऐसा प्रहार किया कि वह कटकर, तलवार सहित अलग जा गिरी। भूरिश्रवा ने कहा कि यह न्यायसंगत नहीं था कि जब वह अर्जुन से नहीं लड़ रहा था, तब अर्जुन ने उसकी बांह काटी। अर्जुन ने प्रत्युत्तर में कहा कि भूरिश्रवा अकेले ही अनेक योद्धाओं से लड़ रहा था, न वह यह देख सकता था कि कौन उससे लड़ने के लिए उद्यत है और कौन नहीं, न अर्जुन ने ही ऐसा विचार किया। अपने मित्र का अहित करने वाले सशस्त्र सैनिक पर वार करना न्यायसंगत है। अपने बायें हाथ से कटा हुआ दायां हाथ उठाकर अर्जुन की ओर भूरिश्रवा ने फेंका, पृथ्वी पर माथा टेक कर प्रणाम किया तथा युद्धक्षेत्र में ही समाधि लेकर आमरण अनशन की घोषणा कर दी। अर्जुन तथा कृष्ण ने उसे निर्मल लोकों में गरुड़ पर आरूढ़ होकर विचरने का आशीर्वाद दिया। वे दोनों ही भूरिश्रवा के वीरत्व तथा धर्मपरायणता के प्रशंसक थे।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

भारतीय मिथक कोश |लेखक: डॉ. उषा पुरी विद्यावाचस्पति |प्रकाशक: नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली |पृष्ठ संख्या: 215 |


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