वर्ण व्यवस्था  

वर्ण व्‍यवस्‍था हिन्दू धर्म में सामाजिक विभाजन का एक आधार है। हिन्दू धर्म-ग्रंथों के अनुसार समाज को चार वर्णों में विभाजित किया गया है- क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य और शूद्र; जबकि और बौद्ध धर्म के ग्रन्थों के अनुसार समाज को छः वर्णों में विभाजित किया गया है।

इन्हें भी देखें: वर्णाश्रम एवं ब्राह्मण

पाणिनिकालीन समाज

पाणिनिकालीन समाज की मूल भित्ति वर्ण और आश्रम की व्यवस्था थी। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र- इन चारों वर्णों का उल्लेख 'अष्टाध्यायी' में हुआ है। वैदिक भाषा का 'वर्ण' शब्द अब भी व्यवहार में आता था, यद्यपि 'जाति' यह नया शब्द भी प्रचलित हो चुका था।[1] पाणिनि-व्याकरण के अनुसार गोत्रों और चरणों की भी पृथक जातियाँ होने लगी थीं। भाष्यकार ने जाति की परिभाषा के अंतर्गत गोत्रों और चरणों को भी गिना है।[2] कतरकतमौ जातिपरिप्रश्ने[3] सूत्र में जाति के विषय में पूछताछ के लिए नियम बताया गया है। यहाँ जाति शब्द से गोत्र और चरण दोनों अभिप्रेत है। कतरकठ: (इन दोनों में कौन कठ है?), कतमकठ: (इनमें कौन कठ है?) ये दोनों प्रश्न चरण-सम्बंधी पूछताछ विषयक होने पर भी जाति-परिप्रश्न के उदाहरण है।


प्राय: प्रत्येक जाति या उपजाति में अपने मूल-निकास की एक अनुश्रुति पाई जाती है। इन मूल स्थान-नामों का यदि संग्रह किया जाए तो यह भी संभव है कि हम 'अष्टाध्यायी' में दिये हुए उन-उन नाम वाले गोत्र के मूल स्थानों की भी पहचान कर सकेंगे। पाणिनि के 4।2।80 सूत्र में इस प्रकार के स्थान-नामों की सत्रह सूचियाँ संग्रहीत हैं। उदाहरण के लिए, पक्षादिगण में 'हंसक' स्थान का नाम है जहाँ से नडादिगण के हंसक गोत्र का विकास हुआ होगा। पाणिनि के समय में योनि-संबंध और विद्या-सम्बंध, इन दो प्रकार के सम्बंधों के आधार पर समाज का अधिकांश संगठन था। योनि सम्बंध गोत्रों के रूप में और विद्या-सम्बंध चरणों के रूप में अपना-अपना जातीय संगठन बना रहे थे। इसी कारण जाति की परिभाषा में गोत्र और चरण इन दोनों को सम्मिलित किया गया।[4] रक्त-सम्बंध और विद्या-सम्बंधों के कारण छोटे-मोटे गिरोहों की अलग-अलग जातियाँ बन रही थीं। कुछ ऐसा लगता है कि जहाँ बेटे पोतों से फूलते-फलते पृथक्-पृथक् सौ घर किसी एक ख्यात, गुट्ट, या अल्ल के अंतर्गत बढ़ जाते थे, वहीं उन कुटुबों के सदस्य समाज में अपने पृथक अस्तित्व का भान और स्मृति एक छोटी उपजाति या गोत्रावयव के रूप में कर लेते थे। पाणिनि ने सावित्री-पुत्रों का उल्लेख किया है।[5] महाभारत में कहा है कि सावित्री-पुत्रों के सौ घराने थे।[6] इसी प्रकार मद्रों में से सौ घराने अलग फूट कर मालवपुत्र नाम की अल्ल से पृथक विख्यात हुए।[7] मालवपुत्र ही वर्तमान 'मलोत्रे' हो सकते हैं।[8]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 2।1।63
  2. गोत्रश्च चरणै: सह 4।1।63)
  3. 2।1।63
  4. गोत्रंच चरणानि च, भाष्य 4।1।63, किसी अन्य वार्तिककार के अनुसार
  5. दामन्यादि 5।3।16
  6. स्वयि पुत्रशतं चैव सत्यवान्‌ अनयिष्यति।
    ते चापि सर्वे राजान: क्षत्रिया: पुत्रपौत्रिण:॥
    ख्यातास्त्वन्नामधेयाश्च भविष्यंतीह शाश्चता:।... वनपर्व, 297।58; कर्णपर्व 5।41
  7. महाभारत वनपर्व, 297।60
  8. पाणिनीकालीन भारत |लेखक: वासुदेवशरण अग्रवाल |प्रकाशक: चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी-1 |संकलन: भारतकोश पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 86 |
  9. वायुपुराण 1, 8, 158
  10. वेदांतसूत्र 1, 3, 34
  11. वेदांतसूत्र- 1, 44, 33
  12. वेदांतसूत्र- 3, 95
  13. वाकरनागेल, द्रष्टव्य रामशरण शर्मा, पृ. 35
  14. 5।4।75
  15. 8।3।97
  16. पाणिनीकालीन भारत |लेखक: वासुदेवशरण अग्रवाल |प्रकाशक: चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी-1 |संकलन: भारतकोश पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 94 |

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