पंचांग  

पंचांग
पंचांग
विवरण पंचांग दिन को नामंकित करने की एक प्रणाली है। पंचांग के चक्र को खगोलीय तत्वों से जोड़ा जाता है।
हिन्दू विक्रम संवत
राष्ट्रीय राष्ट्रीय शाके
इस्मालिक हिजरी संवत
इतिहास ई. पू. 46 में जूलियस सीज़र ने एक संशोधित पंचांग निर्मित किया था जिसमें प्रति चौथे वर्ष 'लीप वर्ष की व्यवस्था थी। परन्तु उस पंचांग की गणनाएँ सही नहीं रहीं, क्योंकि सन् 1582 में 'वासन्तिक विषुव' 21 मार्च को न होकर 10 मार्च को हुआ था।
आधुनिक पंचांग आधुनिक पंचांग में संवत, वर्ष, मास, दिन तथा अन्य धार्मिक एवं सामाजिक रुचिपूर्ण बातें सम्मिलित हैं। चन्द्र मास 29½ दिन से कुछ अधिक तथा अयनवृत्तीय वर्ष 365¼ दिनों से कुछ कम होता है।
संबंधित लेख रोमन कलॅण्डर, सिडरल मास, संवत, माया कैलेंडर, मुस्लिम तिथिपत्र, मन्वन्तर, कल्प, शक संवत
अन्य जानकारी गुजरात एवं उत्तरी भारत (पश्चिम बंगाल को छोड़कर) में 'विक्रम संवत', दक्षिण भारत में 'शक संवत' और कश्मीर में 'लौकिक संवत' का प्रयोग होता है।

पंचांग दिन को नामंकित करने की एक प्रणाली है। पंचांग के चक्र को खगोलीय तत्वों से जोड़ा जाता है। बारह मास का एक वर्ष और 7 दिन का एक सप्ताह रखने का प्रचलन विक्रम संवत से शुरू हुआ। महीने का हिसाब सूर्यचंद्रमा की गति पर रखा जाता है। गणना के आधार पर हिन्दू पंचांग की तीन धाराएँ हैं- पहली चंद्र आधारित, दूसरी नक्षत्र आधारित और तीसरी सूर्य आधारित कैलेंडर पद्धति। भिन्न-भिन्न रूप में यह पूरे भारत में माना जाता है। एक साल में 12 महीने होते हैं। प्रत्येक महीने में 15 दिन के दो पक्ष होते हैं- शुक्ल और कृष्ण। प्रत्येक साल में दो अयन होते हैं। इन दो अयनों की राशियों में 27 नक्षत्र भ्रमण करते रहते हैं।

अर्थ

  • लोक-जीवन में धार्मिक उत्सवों एवं ज्योतिषीय ज्ञान के हेतु, पहले से ही दिनों, मासों एवं वर्ष के सम्बन्ध में जो विधिपूर्वक ग्रन्थ या संग्रह बनता है उसे "पंचांग" या पंजिका या पंजी कहते हैं।
  • व्रतों एवं उत्सवों के सम्पादन के सम्यक कालों तथा यज्ञ, उपनयन, विवाह आदि धार्मिक कृत्यों के लिए उचित कालों के परिज्ञान के लिए हमें पंजी या पंचांग की आवश्यकता पड़ती है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. आर्यभट, पर आधारित मध्यकाल की गणनाएँ, जो अपेक्षाकृत कम ठीक फल प्रकट करती हैं
  2. वैष्णवों के एक सम्प्रदाय के लोगों
  3. ऋग्वेद - 1।25।8
  4. आठ वर्षों के वृत्त
  5. अमेरिकन जर्नल ऑफ सेमेटिक लैंग्वेजेज़, जिल्द 55, 1938, पृ. 116
  6. जर्नल ऑफ हेलेनिस्टिक स्टडीज़, जिल्द 39, पृ. 179
  7. कैलेण्डर रिफॉर्म कमिटी की रिपोर्ट, पृ. 175-176।
  8. यह पश्चात्कालीन रचना है, जिसमें यह आया है कि यह गतकलि 3068 अर्थात् ईसा संवत् से 33 वर्ष पूर्व में निर्मित हुआ
  9. नन्द-यूप शिलालेख में 282 कृत वर्ष; तीन यूपों के मौखरी शिलालेखों में 295 कृत वर्ष; विजयगढ़ स्तम्भ-अभिलेख में 428; मन्दसौर में 461 तथा गदाधर में 480
  10. एक ही अचल तारे पर सूर्य की लगातार एक के उपरान्त एक दो बार पहुँच के बीच का समय
  11. पृथ्वी की दो गतियों (अपनी धुरी पर इसकी प्रतिदिन की गति या चक्कर और सूर्य के चतुर्दिक् इसके वार्षिक चक्कर) के अतिरिक्त एक तीसरी गति भी है जिसे लोग भली-भाँति नहीं जानते हैं। पृथ्वी पूर्णतः गोलक नहीं है, इसका निरक्षीय अर्थात् भूमध्य रेखीय व्यास इसके ध्रुवीय व्यास से बड़ा है। जिसका फल यह होता है कि भूमध्य रेखा पर पदार्थ-समूह उभरा हुआ है, जो उस स्थिति से अधिक है जब कि पृथ्वी पूर्णरूपेण गोल होती। पृथ्वी की धुरी पर एक हल्की सूच्याकार चक्कर में घूमने वाली गति है, जो लट्टू के समान है और वह 25,8000 वर्षों में एक चक्कर लगा पाती है। यह वार्षिक हटना 50".2 सेकेण्ड का है, जो सूर्य एवं चन्द्र के निरक्षीय उभार पर खिंचाव के कारण होता है। इसी से स्थिर तारे, यहाँ तक कि ध्रुव तारा भी एक शती के उपरान्त दूसरी शती या दूसरे काल में अपने स्थानों से परिवर्तित दृष्टिगोचर होते हैं। - नॉर्मन लॉकर एवं हिक्की
  12. नारदसंहिता 3|1-2
  13. ब्राह्मं दैवं मानुषं च पित्र्यं सौरं च सावनम्।
    चान्द्रमार्क्ष गुरोर्मानमिति मानानि वै नव।।
    एषां तु नवमानां व्यवहारोऽत्र पञ्चभिः।
    तेषां पृथक्-पृथक् कार्य वक्ष्यते व्यवहारतः।। नारद-संहिता (3|1-2)।
    कल्प ब्रह्मा का दिन है (सूर्यसिद्धान्त 1|20)!;
    एक मानव-वर्ष देवों के एक दिन के बराबर है (एकं वा एतद् देवानामहो यत्संवत्सरः। तैत्तिरीय ब्राह्मण, 3|9|22|1);
    एक मानव-मास पितरों का अहोरात्र है (मनु 1|66)।
    मानुषमान (मानव मान) विमिश्र (मिश्रित) है क्योंकि लोग विभिन्न उपयोगों के लिए चार मान प्रयुक्त करते हैं, जैसा कि सि0 शि0 (1|30-31) में उल्लिखित है -
    ज्ञेयं विमिश्रं तु मनुष्यमानं मानैश्चर्भिर्व्यवहारवृत्तेः।।
    वर्षायनर्तुयुगपूर्वकमत्र सौरान् मासास्तथा च तिथयस्तुहिनांशुमानात्।
    यत्कृच्छ्रसूतक चिकित्सिवासराद्यं तत्सावनाच्च घटिकादकिमार्क्षमानात्।।) किन्तु उसने आगे कहा है (1|32) कि ग्रहों के मान मानव मान से किए जाते हैं (ग्रहास्तु साध्या मनुजैः स्वमानात्)

  14. काल, पृ. 9
  15. कालनिर्णयकारिका 11-12
  16. अर्थशास्त्र, 2|120, पृ. 108
  17. त्रिंशदहोरात्रः प्रकर्मभासः।
    सार्धसौरः (सार्धः सौरः)।
    अर्धन्यूनश्चान्द्रमासः।
    सप्तर्विशतिर्नक्षत्रमासः।
    द्वार्त्रिशद् मलमासः।
    पञ्चर्त्रिशदश्ववाहायाः।
    चत्वार्रिशद्धस्तिवाहायाः। अर्थशास्त्र (2|20, पृ. 108)।
    महाभाष्य (पाणिनि 4|2|21 के वार्तिक 2 पर) ले भृतकमास (वेतन वाली नौकरी के मास) का उल्लेख किया है जो प्रकर्ममास का परिचायक-सा है।

  18. बृहत्संहिता 2|4, पृ. 40 पर उत्पल द्वारा उदधृत
  19. विष्णुधर्मोत्तर (1|72|26-27)।
  20. तैत्तिरीय ब्राह्मण 1|1|2|13; कौषीतकि ब्राह्मण 5|1; शांखायन ब्राह्मण 19|3; ताण्ड्य ब्राह्मण 5|9|7-12 आदि)।
  21. कालनिर्णय पृ. 61
  22. स्मृतिचन्द्रिका श्राद्ध, पृ. 377
  23. वेदांगज्योतिष 1|5
  24. सचौ 2, पृ. 8-9
  25. कौटिल्य, अर्थशास्त्र 2|6, पृ. 63
  26. महाभारत, वनपर्व130|14-16
  27. महाभारत। अनुशासन, 106|17-30
  28. कृत्यरत्नाकर पृ. 452
  29. विष्णुधर्मोत्तर (1|82|8)
  30. बृहस्पति संहिता 4|27|-52
  31. विष्णुधर्मोत्तर (1|82|9), अग्नि पुराण (अध्याय 139) एवं भविष्य पुराण (ज्योतिस्तत्त्व, पृ. 692-697 में उद्धृत
  32. केतकर का ग्रन्थ, इण्डियन एण्ड फारेन क्रोनोलाजी, पृ. 40
  33. शुद्धिकौमुदी पृ. 272
  34. मलमासतत्त्व पृ. 774
  35. केतकर का ग्रन्थ, इण्डियन एण्ड फॉरेन क्रोनोलाजी पृ. 40
  36. कैलेण्डर रिफॉर्म कमिटी रिपोर्ट, पृ. 246-252।
  37. महाभारत, शान्तिपर्व 301|46-47
  38. कृत्यरत्नाकर पृ. 80
  39. मुहूर्तदर्शन 1|44
  40. तैत्तिरीय संहिता (4|2|31), वाजसनेयी संहिता (13|25
  41. पाणिनी, अष्टाध्यायी 4|2|22
  42. पाणिनी, अष्टाध्यायी 4|2|23
  43. वार्तिक 2, पा0 4|3|35
  44. पाणिनी, अष्टाध्यायी 4|2|2 एवं 4|2|31
  45. ई0 पूर्व दूसरी शती के मेनेण्डर के खरोष्ठी अभिलेख में कार्तिक चतुर्दशी का उल्लेख है
  46. ऐतरेय ब्राह्मण 3|1
  47. तैतरीय संहिता 1|4|4|1 एवं 6|5|3|4
  48. अथर्ववेद 8|6|2
  49. काठसंहिता 38|14
  50. ऋग्वेद 10|136|2, वाजसनेयी संहिता (22|30), शांखायन श्रौतसूत्र (6|12|15
  51. मलमासतत्त्व पृ. 768
  52. वाजसनेयी संहिता 22|30 एवं 31
  53. वाजसनेयी संहिता 7|31
  54. तैतरीय संहिता (1|4|14|1 एवं 6|5|3|4
  55. पद्म पुराण, 6|64
  56. अग्नि पुराण 175|29-30
  57. हेमाद्रि, काल, पृ. 36-63
  58. निर्णयसिन्धु (पृ. 10-15) एवं धर्मसिन्धु (पृ. 5-7
  59. काम्यारम्भं तत्समाप्तिं विवर्जयेत्।
    आरब्धं मलमासात् प्राक् कृच्छ्रं चान्द्रादिकं तु यत्।
    तत्समाप्यं सावनस्य मानस्यानतिलंघनात्।।
    आरम्भस्य समाप्तेश्च मध्ये स्याच्चेन्मलिम्लुचः।
    प्रवृत्तमखिलं काम्यं तदानुष्ठेयमेव तु।।
    कारीर्यादि तु यत्काम्यं तस्यारम्भसमापने कार्यकालविलम्बस्य प्रतीक्षाया असम्भवात्।।
    अनन्यगतिकं नित्यमग्निहोत्रादि न त्यजेत्।
    गत्यन्तरयुतं नित्यं सोमयागादि वर्जयेत्।। - कालनिर्णय-कारिका (21-24)।

  60. हेमाद्रि, काल, पृ. 52; समय प्रकाश, पृ. 145
  61. ऋग्वेद 6|9|1
  62. अहश्च कृष्णमहरर्जुनं च वि वर्तेते रजसी वेद्याभिः
  63. जेनेसिरा 2|1-3
  64. एक्सोडस 20|8-11,23|12-14
  65. डेउटेरोनामी 5|12-15
  66. मैथ्यू, 28|1; मार्क, 16|9; ल्यूक, 24|1
  67. याज्ञवल्क्य स्मृति 1|293
  68. विष्णुपुराण 1|12|92
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