धर्मकीर्ति बौद्धाचार्य  

धर्मकीर्ति धर्मपाल और ईश्वरसेन के शिष्य थे। बौद्ध न्याय की जिस परम्परा का प्रारम्भ मैत्रेयनाथ, असंग और वसुबन्धु की कृतियों से हुआ था, उसे आचार्य दिङ्नाग ने अपनी कृतियों में वाद विधि से पृथक् तर्कशास्त्र या हेतुशास्त्र के रूप में विकसित किया। आगे चलकर दिङ्नाग द्वारा प्रवर्तित इस तर्क विद्या को धर्मपाल एवं ईश्वरसेन के शिष्य आचार्य धर्मकीर्ति ने (बौद्ध न्याय को) 'प्रमाणशास्त्र' के रूप में विकसित किया।

समय काल

तिब्बती परम्परा के अनुसार आचार्य कुमारिल और आचार्य धर्मकीर्ति समकालीन थे। कुमारिल ने दिङ्नाग का खण्डन तो किया है, किन्तु धर्मकीर्ति का नहीं, जबकि धर्मकीर्ति ने कुमारिल का खण्डन किया है। ऐसी स्थिति में कुमारिल आचार्य धर्मकीर्ति के वृद्ध समकालीन ही हो सकते हैं। आचार्य धर्मकीर्ति ने तर्कशास्त्र का अध्ययन ईश्वरसेन से किया था, किन्तु उनके दीक्षा गुरु प्रसिद्ध विद्वान् एवं नालन्दा के आचार्य धर्मपाल थे। धर्मपाल को वसुबन्धु का शिष्य कहा गया है। वसुबन्धु का समय चौथी शताब्दी निश्चित किया गया है। धर्मपाल के शिष्य शीलभद्र ईस्वीय वर्ष 635 में विद्यमान थे, जब ह्वेनसांग नालन्दा पहुँचे थे। अत: यह मानना होगा कि जिस समय धर्मकीर्ति दीक्षित हुए, उस समय धर्मपाल मरणासन्न थे। इस दृष्टि से विचार करने पर धर्मकीर्ति का काल 550-600 हो सकता है।

यश पताका

धर्मकीर्ति के ग्रन्थों में जिस न्यायशास्त्र या प्रमाण विद्या का विशद रूप में प्रौढ़ रीति से उपन्यास मिलता है, वह समस्त परवर्ती बौद्ध न्यायशास्त्र और ब्राह्मण तथा जैन न्याय के विकास का भी मूल आधार बना। न केवल भारत अपितु तिब्बत, चीन, मध्य एशिया एवं दक्षिण पूर्व के तमाम देशों में धर्मकीर्ति की यश पताका विगत चौदह सौ वर्षों से फहरा रही है। उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत न केवल भारतीय दार्शनिक परम्परा में प्रमाणवाद के मेरुदंड के रूप में स्वीकृत हुए, अपितु बाहरी देशों में भी उनके अनुवाद अत्यन्त लोकप्रिय हुए। किन्तु संस्कृत या किसी अन्य भाषा में धर्मकीर्ति की जीवनी का कोई क्रमबद्ध या व्यवस्थित विवरण उपलब्ध नहीं होता। तारानाथ और बु-दोन् के विविरणों से कतिपय तथ्य निकलते हैं, जिनमें धर्मकीर्ति के जीवन पर प्रकाश पड़ता है।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 1.3 1.4 1.5 1.6 1.7 विश्व के प्रमुख दार्शनिक |लेखक: डॉक्टर करुणेश शुक्ल |प्रकाशक: वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, नई दिल्ली, 684 |पृष्ठ संख्या: 242 |
  2. स्वार्थानुमान परिच्छेद स्ववृत्तिसहित
  3. विपंचितार्था टीका के साथ
  4. प्रमाणवार्तिक 3/ 123 – 124

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