न्याय दर्शन  

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न्याय दर्शन
न्याय दर्शन
विवरण 'न्याय दर्शन' भारत के छः वैदिक दर्शनों में से एक दर्शन है। 'न्यायसूत्र इस दर्शन का सबसे प्राचीन एवं प्रसिद्ध ग्रन्थ है।
प्रवर्तक अक्षपाद गौतम
प्रमुख ग्रंथ 'न्यायसूत्र'
महत्त्व न्याय दर्शन की सबसे बड़ी देन निष्कर्ष की विवेचना प्रणाली का विस्तृत वर्णन है।
प्रतिपाद्य यहाँ न्याय दर्शन के प्रतिपाद्य सोलह पदार्थों का यथाक्रम संक्षेप में परिचय प्रस्तुत है।
विशेष वात्स्यायन ने 'न्याय' को समस्त विद्याओं का 'प्रदीप' कहा है। 'न्याय' का व्यापक अर्थ है- "विभिन्न प्रमाणों की सहायता से वस्तुतत्त्व की परीक्षा"।
संबंधित लेख भारतीय दर्शन, न्यायसूत्र, न्याय दर्शन के प्रवर्तक, न्याय दर्शन का इतिहास
अन्य जानकारी आस्तिक दर्शनों में न्याय दर्शन का प्रमुख स्थान है। वैदिक धर्म के स्वरूप के अनुसन्धान के लिए न्याय की परम उपादेयता है। इसीलिए 'मनुस्मृति' में श्रुत्यनुगामी तर्क की सहायता से ही धर्म के रहस्य को जानने की बात कही गई है।

न्याय संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ है- "व्युत्पत्ति के आधार पर मार्गदर्शन करने वाला"। बाद में इसका निश्चित अर्थ नियम हो गया, जो व्यक्ति को किसी निष्कर्ष, पाठ की व्याख्या के सिद्धांत या तर्क तक ले जाता है। भारतीय व्याख्यात्मक और विवेकपूर्ण चिंतन के आरंभिक काल में न्याय का उपयोग सामान्यत: मीमांसा द्वारा विकसित विवेचन के सिद्धांतों के लिये किया गया है। लेकिन बाद में इस शब्द का उपयोग भारतीय दर्शन की छह प्रणालियों (दर्शनों) में से एक के लिए होने लगा, जो अपने तर्क तथा ज्ञान मीमांसा के विश्लेषण के लिए महत्त्वपूर्ण था। न्याय दर्शन की सबसे बड़ी देन निष्कर्ष की विवेचना प्रणाली का विस्तृत वर्णन है।

न्याय में दर्शन तथा धर्म

अन्य प्रणालियों के समान न्याय में भी दर्शन और धर्म, दोनों हैं ; लेकिन इसका धार्मिक तत्व सामान्यत: आस्तिकता या ईश्वर के आस्तित्व को स्थापित करने से आगे नहीं बढ़ता। ईश्वर तक पहुँचने के मार्ग को इसने विचार तथा तकनीक की अन्य परंपराओं के लिए छोड़ दिया है। न्याय का परम उद्देश्य मनुष्य के उस दु:खभोग को समाप्त करना है। जिसका मूल कारण वास्तविकता की अज्ञानता है। अन्य प्रणालियों के अनुसार, इसमें भी यह स्वीकार किया जाता है, सम्यक ज्ञान से ही मुक्ति मिल सकती है। इसके बाद यह मुख्यत: सम्यक ज्ञान के साधनों की विवेचना करता है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. बिना शर्त के
  2. तत्त्व, जिससे प्रभाव की उत्पत्ति होती है
  3. जो कारण की उत्पत्ति में सहायता करता है
  4. वस्तु, क्रिया या शक्ति, जो भौतिक कारण के उत्पादन में सहायता करती है
  5. प्रमाणैरर्थपरीक्षणं न्याय:। (वा.न्या.भा. 1/1/1)।
  6. (वाल्मीकि रामायण. अयोध्या काण्ड 100.38-39
  7. भवेत् पण्डितमानी च ब्राह्मणो वेदनिन्दक:। आन्वीक्षिकीं तर्कविद्यामनुरक्तो निरर्थिकाम्॥ (अनुशासन पर्व 37.12
  8. योऽवमन्येत ते मूले हेतुशास्त्राश्रयाद् द्विज: स साधुर्भिर्बहिष्कार्यो नास्तिको वेदनिन्दक:॥ (मनु. 2.11) हेतुकान् वकवृत्तींश्च वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत्। (मनु. 2.11
  9. द्र. शाङ्करभाष्य 1/1/4/

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