हिरण्यकेशी श्रौतसूत्र  

(हिरण्यकेशि श्रौतसूत्र से पुनर्निर्देशित)


कृष्णयजुर्वेद श्रौतसूत्रों के मध्य इसका स्थान आपस्तम्ब के अनन्तर है। 'वैजयन्ती' कार महादेव दीक्षित ने इसके रचयिता को नामकरण के यथार्थ अनुरूप बतलाते हुए सूत्रग्रन्थ को निगूढ भावों और अचर्चित विधियों से युक्त कहा है– 'अतीव गूढार्थ मनन्यदर्शितं न्यायैश्च युक्तं रचयन्नसौ पुन:। हिरण्यकेशीति यथार्थ नामभाग भूद्वरात्तुष्ट मुनीन्द्रसम्मतात्।।' भाष्य के उपोद्घातगत एक अन्य पद्य में सत्याषाढ को भगवान विष्णु का अवतार माना गया है– 'श्रीमद् भगवतो विष्णोरवतारेण सूत्रितम्। सत्याषाढेन ........।' व्याख्याकार महादेव ने ये सूचना भी अंकित की है कि उनके समय में ही यह सूत्र लुप्तप्राय था और कहीं–कहीं ही उपलब्ध था। दक्षिण में ताम्रपर्णी नदी के तटीय क्षेत्रों में इसका विशेष प्रचार था–

लुप्तप्रायमिदं सूत्रं दैवादासीत् क्वचित् क्वचित्।
दक्षिणस्यां ताम्रपर्ण्यास्तीरेष्विदमाहृतम्।।

रचयिता

तैत्तिरीय शाखा के ही अन्तर्गत हिरण्यकेशि उपशाखा है, जो सूत्र–भेद पर निर्भर है, संहिता–भेद पर नहीं। हिरण्यकेशि आचार्य को सत्यावलम्बन के कारण अपने पिता से सत्याषाढ नाम मिला था। वही इस सूत्र के प्रणेता माने जाते हैं। सम्पूर्ण हिरण्यकेशि कल्प में महादेव के अनुसार सत्ताईस प्रश्न हैं, जिनमें से दो (19–20) गृह्यसूत्र, एक (25वाँ) शुल्बसूत्र, दो धर्मसूत्र (26–27) माने जाते हैं। इस प्रकार श्रौतसूत्र की व्याप्ति कुल 22 प्रश्नों में है तथा प्रश्नों का अवान्तर विभाजन पटलों में है। इसकी विषय–वस्तु इस प्रकार है–

  • प्रश्न 1 व 2– परिभाषा पूर्वक,
  • प्रश्न 3– अग्न्याधेय, अग्निहोत्र और आग्रयण,
  • प्रश्न 4– निरूढ पशुबन्ध,
  • प्रश्न 5– चातुर्मास्य,
  • प्रश्न 6– याजमान की सामान्य और विशेष विधि,
  • प्रश्न 7 से 10– ज्योतिष्टोम,
  • प्रश्न 11 व 12– अग्निचयन,
  • प्रश्न 13– वाजपेय, राजसूय तथा चरक सौत्रामणी,
  • प्रश्न 14– अश्वमेध, पुरुषमेध, सर्वमेध,
  • प्रश्न 15– प्रायश्चित्त,
  • प्रश्न 16– द्वादशाह, गवामयन (महाव्रत सहित),
  • प्रश्न 17– अयन, एकाह, अहीन,
  • प्रश्न 18– सत्रयाग,
  • प्रश्न 19 से 21– होत्र, प्रवर,
  • प्रश्न 22– कामेष्टियाँ तथा काम्यपशुयाग,
  • प्रश्न 23– सौत्रामणी (कौकिली), सव, काठक चयन,
  • प्रश्न 24– प्रवर्ग्य।

भारद्वाज और आपस्तम्ब श्रौतसूत्रों का इस पर बहुत प्रभाव है। पितृमेध सूत्र तो सम्पूर्ण रूप से ही भारद्वाज का ले लिया गया है, जैसा कि महादेव जी का कथन है– 'पितृमेधस्तु भारद्वाजीयो मुनिना परिगृहीतौ द्वौ प्रश्नौ।'

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. सत्याषाढ श्रौतसूत्र 14.1.47
  2. सत्याषाढ श्रौतसूत्र 1.1

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