बृहदारण्यकोपनिषद  

यह उपनिषद शुक्ल यजुर्वेद की काण्व-शाखा के अन्तर्गत आता है। 'बृहत' (बड़ा) और 'आरण्यक' (वन) दो शब्दों के मेल से इसका यह 'बृहदारण्यक' नाम पड़ा है। इसमें छह अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय में अनेक 'ब्राह्मण' हैं। बृहदारण्यक उपनिषदों पर भर्तु प्रपंच ने भाष्य रचना की थी।

प्रथम अध्याय

इसमें छह ब्राह्मण हैं।

  • प्रथम ब्राह्मण में, सृष्टि-रूप यज्ञ' को अश्वमेध यज्ञ के विराट अश्व के समान प्रस्तुत किया गया है। यह अत्यन्त प्रतीकात्मक और रहस्यात्मक है। इसमें प्रमुख रूप से विराट प्रकृति की उपासना द्वारा 'ब्रह्म' की उपासना की गयी है।
  • दूसरे ब्राह्मण में, प्रलय के बाद 'सृष्टि की उत्पत्ति' का वर्णन है।
  • तीसरे ब्राह्मण में, देवताओं और असुरों के 'प्राण की महिमा' और उसके भेद स्पष्ट किये गये हैं।
  • चौथे ब्राह्मण में, 'ब्रह्म को सर्वरूप' स्वीकार किया गया है और चारों वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) के विकास क्रम को प्रस्तुत किया गया है।
  • पांचवें ब्राह्मण में, सात प्रकार के अन्नों की उत्पत्ति का उल्लेख है और सम्पूर्ण सृष्टि को 'मन, वाणी और प्राण' के रूप में विभाजित किया गया है।
  • छठे ब्राह्मण में, 'नाम, रूप और कर्म' की चर्चा की गयी है।

प्रथम ब्राह्मण
इस ब्राह्मण में प्रकृति के विराट रूप की तुलना 'अश्वमेध यज्ञ' के घोड़े से की गयी है। उसके विविध अंगों में सृष्टि के विविध स्वरूपों की कल्पना की गयी है। 'अश्व' शब्द शक्ति और गति का परिचायक हैं। यह सम्पूर्ण ब्राह्मण भी निरन्तर सतत गतिशील है। इस प्रकार वैदिक ऋषि अश्वमेध के अश्व के माध्यम से सम्पूर्ण सृष्टि को उस अज्ञात शक्ति द्वारा सतत गतिशील सिद्ध करते हैं। 'अश्व' उस राजा की शक्ति का प्रतीक है, जो चक्रवर्ती कहलाना चाहता हैं इसी भांति यह सम्पूर्ण सृष्टि उस परब्रह्म की शक्ति का प्रतीक है। जिस प्रकार अश्वमेध यज्ञ में 'अश्व' की पूजा की जाती है और बाद में उसकी बलि चढ़ा दी जाती है, उसी प्रकार साधक इस सृष्टि की उपासना करता है, किन्तु अन्त में इस सृष्टि को नश्वर जानकर छोड़ देता है और इससे परे उस 'ब्रह्म' को ही अनुभव करता है, जो इस सृष्टि का नियन्ता है। जैसे लोकिक जगत् में सभी 'अश्व' से परे उस 'राजा' को देखते हैं, जिसके यज्ञ का वह घोड़ा है तथा 'राजा' ही प्रमुख होता है, वैसे ही अध्यात्मिक जगत् में वह 'ब्रह्म' है। उदाहरण के रूप में ऋषियों की इस कल्पना का अवलोकन करें- यह यज्ञीय अश्व या विश्वव्यापी शक्ति प्रवाह का सिर 'उषाकाल' है। आदित्य (सूर्य) नेत्र हैं, वायु प्राण है, खुला मुख 'आत्मा' है, अन्तरिक्ष उदर है, दिन और रात्रि दोनों पैर हैं, नक्षत्र समूह अस्थियां हैं और आकाश मांस है। मेघों का गर्जन उसकी अंगड़ाई है और जल-वर्षा उसका मूत्र है और शब्द घोष (हिनहिनाना) वाणी है। वास्तव में ये उपमाएं उस विराट सृष्टि का केवल बोध कराती हैं। दूसरे शब्दों में ऋषिगण मूर्त प्रतीकों के द्वारा अमूर्त ब्रह्म की विराट संचेतना का दिग्दर्शन कराते हैं। वही उपासना के योग्य है।
दूसरा ब्राह्मण
इसमें सृष्टि के जन्म की अद्भुत कल्पना की गयी है। कोई नहीं जानता कि सृष्टि का निर्माण और विकास कैसे हुआ, किन्तु वैदिक ऋषियों ने अत्यन्त वैज्ञानिक ढंग से सृष्टि के विकास-क्रम को प्रस्तुत किया है। उनका कहना है कि सृष्टि के प्रारम्भ में कुछ नहीं था। केवल एक 'सत्' ही था, जो प्रलय-रूपी मृत्यु से ढका हुआ था। तब उसने संकल्प किया कि उसे पुन: उदित होना है। उस संकल्प के द्वारा आप: (जल) का प्रादुर्भाव हुआ। इस जल के ऊपर स्थूल कण एकत्र हो जाने से पृथ्वी की उत्पत्ति हुई। उसके उपरान्त सृष्टि के सृजनकर्ता के श्रम-स्वरूप उसका तेज़ अग्नि के रूप में प्रकट हुआ। तदुपरान्त परमेश्वर ने अपने अग्नि-रूप के तृतीयांश को सूर्य, वायु और अग्नि तीन भागों में विभक्त कर दिया। पूर्व दिशा उसका शीर्ष भाग (सिर), उत्तर-दक्षिण दिशाएं उसका पार्श्व भाग औ द्युलोक उसका पृष्ठ भाग, अन्तरिक्ष उदर, पृथ्वी वक्षस्थल और अग्नि तत्त्व उस विराट पुरुष की आत्मा बने। यही प्राणतत्त्व कहलाया। इसके बाद इस विराट पुरुष की इच्छा हुई कि अन्य शरीर उत्पन्न हों। तब मिथुनात्मक सृष्टि का निर्माण प्रारम्भ हुआ। नर-नारी, पशु और पक्षियों तथा जलचरों में नर-मादा के युग्म बने और उनके मिथुन-संयोग से जीवन का क्रमिक विकास हुआ। फिर इसके पालन के लिए अन्न से मन और मन से वाणी का सृजन हुआ। वाणी से ऋक्, यजु, साम का सृजन हुआ।
तीसरा ब्राह्मण
यहाँ प्रजापति-पुत्रों के दो वर्गों का उल्लेख है। एक देवगण, दूसरे असुर। देवगण संख्या में कम थे और असुरगण अधिक। दोनों में प्रतिस्पर्द्धा होने लगी। देवताओं ने निश्चय किया कि वे यज्ञ में 'उद्गीथ' (सामूहिक मन्त्रगान) द्वारा असुरों पर हावी होने का प्रयत्न करें। ऐसा विचार करके उन्होंने, पहले वाक् से, फिर प्राण, चक्षु, कान, मन, मुख प्राण आदि से उद्गीथ पाठ करने का निवेदन किया। सभी ने देवताओं के लिए 'उद्गीथ' किया, परन्तु हर बार असुरगणों ने उन्हें पाप से मुक्त कर दिया। इस कारण वाणी, प्राण-शक्ति, चक्षु, कान या मन दूषित हो गये, किन्तु मुख में निवास करने वाले प्राण को वे दूषित नहीं कर सके। वहां असुरगण पूरी तरह पराजित हो गये। इस मुख में समस्त अंगों का रस होने के कारण इसे 'आंगिरस' भी कहा जाता है। इस प्राण-रूप देवता ने इन्द्रियों के समस्त पापों को नष्ट करके उन्हें शरीर की सीमा से बाहर कर दिया। तब उस प्राणदेवता ने वाग्देवता (वाणी), चक्षु, घ्राण-शक्ति, श्रवण-शक्ति, मन-शक्ति आदि से मृत्यु-भय को दूर कर दिया और फिर प्राण-शक्ति को भी मृत्यु-भय से दूर कर दिया। समस्त देवगुण प्राण में प्रवेश कर गये और अभय हो गये। यह प्राण ही 'साम' है। वाक् ही 'सा' और प्राण ही 'अम' है। दोनों के सहयोग से 'साम' बनता है, अर्थात् यदि प्राणतत्त्व से गायन किया जाये, तो वह जीवन-साधना को सफल बनाता है। वाणी और हृदयगत भावों का संयोग सामगान को अमर बना देता है। ऐसा गान करने वाला धन-धान्य व ऐश्वर्य से सम्पन्न होता है। उसे प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।
चौथा ब्राह्मण
यहाँ 'ब्रह्म' की एकांगीता पर प्रकाश डाला गया है। ब्रह्म के सिवा सृष्टि में कोई दूसरा नहीं है। उसके लिए यही कहा जा सकता है- 'अहस्मि, 'अर्थात् मैं हूं। इसीलिए ब्रह्म को अहम संज्ञक कहा जाता है। एकाकी होने के कारण वह रमा नहीं। तब उसने किसी अन्य की आकांक्षा की। तब उसने अपने को नारी के रूप में विभक्त कर दिया। 'अर्द्धनारीश्वर' की कल्पना इसीलिए की गयी है। पुरुष और स्त्री के मिलन से मानव-जीवन का विकास हुआ। प्रथम चरण में प्रकृति संकल्प करके सव्यं को जिस-जिस पशु-पक्षी आदि जीवों के रूप में ढालती गयी, उसका वैसा-वैसा रूप बनता गया और उसी के अनुसार उनके युग्म बने और मैथुनी सृष्टि से जीवन के विविध रूपों का जन्म हुआ। सबसे पहले ब्रह्म 'ब्राह्मण' वर्ण में था। पुन: उसने अपनी रक्षा के लिए क्षत्रिय वर्ण का सृजन किया। फिर उसने वैश्य वर्ण का सृजन किया और अन्त में शूद्र वर्ण का सृजन किया और उन्हीं की प्रवृत्तियों के अनुसार उनके कार्यों का विभाजन किया। कर्म का विस्तार होने के उपरान्त 'धर्म' की उत्पत्ति की। धर्म से श्रेष्ठ कुछ भी नहीं हे। धर्म की सत्या है। इसी ने 'आत्मा' से परिचय करायां यह 'आत्मा' ही समस्त जीवों को आश्रय प्रदाता है। यज्ञ द्वारा इसी 'आत्माय को प्रसन्न करने से देवलोक की प्राप्ति होती है।
पांचवां ब्राह्मण
परमापिता ने सृष्टि का सृजन करके क्षुधा-तृप्ति के लिए चार प्रकार के अन्नों का सृजन किया। उनमें एक प्रकार का अन्न सभी के लिए, दूसरे प्रकार का अन्न देवताओं के लिए, तीसरे प्रकार का अन्न अपने लिए तथा चौथे प्रकार का पशुओं के लिए वितरित कर दिया। धरती से उत्पन्न अन्न सभी के लिए है। उसे सभी को समान रूप से उपभोग करने का अधिकार है। हवन द्वारा दया जाने अन्न देवताओं के लिए है। पशुओं को दिया जाने वाला खाद्यान्न दूध उत्पन्न करता है। यह दूध सभी के पीने योग्य हे। शीघ्र उत्पन्न हुए बचच् को स्तनपान से दूध ही दिया जाता है। कहा गया कि एक वर्ष तक दूध से निरन्तर अग्निहोत्र करने पर मृत्यु भी वश में हो जाती हे। उस पुरुष ने तीन अन्नों का चयन अपने लिए किया। ये तीन अन्न-'मन, 'वाणी' और 'प्राण' हैं वाणी द्वारा पृथ्वीलोक को, मन द्वारा अन्तरिक्षलोक को और प्राण द्वारा स्वर्गलोक को पाया जा सकता है। वाणी ॠग्वेद, मन यजुर्वेद और प्राण सामवेद है। जो कुछ भी जानने योग्य है, वह मन का स्वरूप है। वाणी ज्ञान-स्वरूप होकर जीवात्मा की रक्षा करती है और जो कुछ अनजाना है, वह प्राण-स्वरूप है। इस विश्व में जो कुछ भी स्वाध्याय या ज्ञान है, वह सब 'ब्रह्म' से ही एकीकृत है। वस्तुत: यह सूर्य निश्चित रूप से प्राण से ही उदित होता है और प्राण में ही समा जाता है।
छठा ब्राह्मण
इस संसार में जो कुछ भी है, वह नाम, रूप और कर्म, इन तीनों का ही समुदाय है। इन नामों का उपादान 'वाणी' हैं। समस्त नामों की उत्पत्ति इस वाणी द्वारा ही होती है। समस्त रूपों का उपादान 'चक्षु' है। समस्त सूर्य इस चक्षु से ही उत्पन्न होते हैं। समस्त रूपों को धारण करने से चक्षु ही इन रूपों का प्राण है, 'ब्रह्म' है। समस्त कर्मों का उपादान यह 'आत्मा' है। समस्त कर्म शरीर से ही होते हैं और उसकी प्रेरणा शरीर में स्थित यह आत्मा ही देती है। यह 'आत्मा' ही सब कर्मों का 'ब्रह्म' है। आत्मा द्वारा ही नाम, रूप और कर्म उत्पन्न हुए हैं। अत: ये तीनों अलग होते हुए भी एक आत्मा ही हैं। यह आत्मा सत्य से आच्छादित है। यही अमृत है। प्राण ही अमृत-स्वरूप है। नाम और रूप ही सत्य हैं। अमृत और सत्य से ही प्राण आच्छन्न है, ढका हुआ है, अज्ञात है।

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