कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद  

यह उपनिषद ऋग्वेद के कौषीतकि ब्राह्मण का अंश है। इसमें कुल चार अध्याय हैं। इस उपनिषद में जीवात्मा और ब्रह्मलोक, प्राणोपासना, अग्निहोत्र, विविध उपासनाएं, प्राणतत्त्व की महिमा तथा सूर्य, चन्द्र, विद्युत मेघ, आकाश, वायु, अग्नि, जल, दर्पण और प्रतिध्वनि में विद्यमान चैतन्य तत्त्व की उपासना पर प्रकाश डाला गया है। अन्त में 'आत्मतत्त्व' के स्वरूप और उसकी उपासना से प्राप्त फल पर विचार किया गया है।

प्रथम अध्याय

प्रथम अध्याय में गौतम ऋषि (उद्दालक) एवं गर्ग ऋषि के प्रपौत्र चित्र के संवादों द्वारा 'ब्रह्मज्ञान' के लिए किये जाने वाले अग्निहोत्र तथा उसकी फलश्रुति पर प्रकाश डाला गया है। जब मृत्यु के उपरान्त साधक ब्रह्मलोक पहुंचता हैं, तो उसका सामना अप्सराओं और एक विचित्र पंलग (पर्यंक) पर बैठे ब्रह्माजी से होता है। वह उनसे बातें करता है। इस वार्तालाप को 'पर्यंक-विद्या' भी कहते हैं। गर्ग ऋषि के प्रपौत्र, महर्षि चित्र, यज्ञ करने का निश्चय करके अरुण के पुत्र महात्मा उद्दालक (गौतम) को प्रधान ऋत्विक के रूप में आमन्त्रित करते हैं, परन्तु मुनि उद्दालक स्वयं न जाकर अपने पुत्र श्वेतकेतु को यज्ञ सम्पन्न कराने के लिए भेज देते हैं। श्वेतकेतु अपने पिता की आज्ञानुसार वहां पहुंचकर एक ऊंचे आसन पर विराजमान होते हैं। तब चित्र उससे प्रश्न करता है-'हे गौतमकुमार! इस लोक में कोई ऐसा आवरणयुक्त स्थान है, जहां तुम मुझे ले जाकर रख सकते हो या फिर उसमें भी कोई ऐसा सर्वथा पृथक् और विलक्षण आवरण से शून्य पद है, जिसको जानकर तुम उसी लोक में मुझे प्रतिष्ठित कर सकते हो?'
चित्र की बात सुनकर श्वेतकेतु ने महर्षि चित्र से कहा-'हे भगवन! मैं यह सब नहीं जानता। मेरे पिता आचार्य हैं। मैं उन्हीं से इस प्रश्न को पूछूंगा।'
ऐसा कहकर श्वेतकेतु यज्ञ का आसन छोड़कर चले गये और अपने पिता से प्रश्न किया-'हे पिताश्री! महर्षि चित्र ने जो प्रश्न मुझसे किया है, उसका उत्तर में कैसे दूं?' श्वेतकेतु ने चित्र का प्रश्न अपने पिता के सामने दोहरा दिया। तब उद्दालक ऋषि ने कहा-'पुत्र! मैं भी इसका उत्तर नहीं जानता। हम दोनों महर्षि चित्र की यज्ञशाला में चलकर व इसका अध्ययन करके ही इस विद्या को प्राप्त करेंगे।'
तदनन्तर दोनों पिता-पुत्र प्रसिद्ध आरुणि मुनि के हाथ से समिधा ग्रहण करके जिज्ञासु-भाव से महर्षि चित्र के पास गये और कहा कि वे विद्या-प्राप्ति हेतु उनके पास आये हैं। चित्र ने कहा-'हे गौतम! आप ब्राह्मणों में अति पूजनीय हैं और ब्रह्मविद्या के अधिकारी है; क्योंकि मेरे पास आते हुए आपके मन में अपनी श्रेष्ठता का तनिक-भी अभिमान नहीं है। मैं निश्चय ही आपको इसका बोध कराऊंगा।'
महर्षि चित्र ने कहा-'हे विप्रवर! जो व्यक्ति अग्निहोत्रादि सत्कार्यों का अनुष्ठान करने वाले हैं, वे सभी इस लोक से चन्द्रलोक, अर्थात् स्वर्गलोक की ओर गमन करते हैं, लेकिन जो व्यक्ति स्वर्गीय सुख के प्रति आसक्त होकर चन्द्रलोक स्वीकार कर लेता है, उसके सभी पुण्य नष्ट हो जाते हैं और वह पुन: इस धरती पर वापस आ गिरता है, अर्थात् उसका फिर से पुनर्जन्म हो जात है। उसे मोक्ष नहीं मिल पाता।'
महर्षि चित्र के ऐसा कहने पर गौतम मुनि ने फिर पूछा-'हे भगवन! मुझे बतायें कि मैं कौन हूँ? मुझे इस भवसागर से पार होने का वह उपाय बतायें, जिससे मैं समस्त भव-बन्धनों से मुक्त हो सकूं?'
ब्रह्मज्ञान क्या हैं?
तब महर्षि चित्र ने उसे 'ब्रह्मज्ञान' का उपदेश दिया और सर्वप्रथम बताया कि जीवात्मा इस लोक से परलोक अथवा 'ब्रह्मलोक' तक दो मार्गों से ही जा सकता है। एक 'पितृयान' मार्ग है और दूसरा 'देवयान' मार्ग। पितृयान मार्ग से जाने वाले साधक का बार-बार जन्म होता है, उसे मोक्ष प्राप्त नहीं होता, परन्तु देवयान मार्ग से जाने वाले साधक का पुनर्जन्म नहीं होता, उसे मोक्ष प्राप्त हो जाता है। स्वर्ग व नरक के वास्तविक स्वरूप को जानकर, जो साधक विरक्त हो जाता है, वही गुरु से 'ब्रह्मविद्या' पाने का अधिकारी होता है।
महर्षि चित्र ने कहा-'हे गौतम! देवयान मार्ग से जाने वाला साधक क्रमश: अग्निलोक, वायुलोक, सूर्यलोक, वरुणलोक, इन्द्रलोकप्रजापतिलोक आदि छह लोकों में से होता हुआ 'ब्रह्मलोक' में प्रवेश कर पाता है। 'ब्रह्मलोक' के प्रवेश द्वार पर 'अर' नाम का एक बड़ा जलाशय है। यह जलाशय काम, क्रोध, मोह आदि शत्रुओं द्वारा निर्तित है। यहाँ पल-भर का भी अहंकार और काम, क्रोध, लोभ आदि का बन्धन, साधक के सभी पुण्यों को नष्ट कर डालता है। 'इष्ट' की प्राप्ति में यह जलाशय सबसे बड़ी बाधा है, परन्तु जो इसे पार कर लेता है, वह फिर से पावन विरजा नदी के किनारे पहुंच जाता है। उसका समस्त श्रम और वृद्धावस्था, विरजा नदी के दर्शन मात्र से ही दूर हो जाते हैं। उसमें आगे 'इल्य' नामक वृक्ष (पृथिवी का एक नाम इला भी है) आता है। यहीं पर अनेक देवताओं के सुन्दर उपवनों, उद्यानों, बावली, कूप, सरोवर, नदी और जलाशय आदि से युक्त नगर है, जो विरजा नदी और अर्धचन्द्राकार परकोटे से घिरा है। ये सभी मन को बार-बार मोहने के लिए सामने आते हैं, किन्तु जो साधक इनमें लिप्त न होकर आगे बढ़ जाता है, उसे सामने ही ब्रह्मा जी का एक विशाल देवालय दिखाई पड़ता है। इस देवालय का नाम 'अपराजिता' है। सूर्य की प्रखर रश्मियों से युक्त होने के कारण इसे विजित करना अत्यन्त कठिन है। इसकी रक्षा मेघ, यज्ञ से उपलक्षित वायु तथा आकाश-स्वरूप इन्द्र एवं प्रजापति द्वारा की जाती है, परन्तु जो उन्हें पराजित कर लेता है, वह ब्रह्मलोक में प्रवेश कर जाता है। वहां एक विशाल वैभव-सम्पन्न सभा-मण्डप के मध्य 'विचक्षणा' (अध्यात्मिक) नामक वेदी (चबूतरा) पर सर्वशक्तिमान प्राणस्वरूप ब्रह्मा जी एक अति सुन्दर सिंहासन (पंलग) पर विराजमान दिखाई पड़ते हैं। विश्व जननी अम्बा और अम्बवयवी नामक अप्सराएं उनकी सेवा में रत हैं, जो ब्रह्मवेत्ता साधक का स्वागत करती हैं और उसे अलंकृत करके ब्रह्मा जी के सम्मुख उपस्थित करती हैं।'
इस उपनिषद में एक अत्यन्त सुन्दर रूपक बांधकर देवयान मार्ग से ब्रह्मलोक तक पहुंचने का मार्ग दिखाया गया है। यहीं पर ऋषि कहता है कि रथ में बैठकर यात्रा करने वाला पुरुष, जिस प्रकार रथ के पहियों को दौड़ते हुए तो देखता है, परन्तु वह पहियों की गति के भूमि से होने वाले संयोग को नहीं देख पाता। इसी प्रकार ब्रह्मलोक की यात्रा करने वाला साधक रथ पर बैठकर दिन और रात को तो देखता है, काल की गति को भी देखता है, पाप-पुण्य को भी देखता है, परन्तु वह उनमें लिप्त नहीं होता। वह उनसे दूर रहकर ही 'ब्रह्म' को प्राप्त करता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार उसके मार्ग के बाधक नहीं बनता।
महर्षि चित्र आगे बताते हैं-'हे गौतम! ब्रह्मवेत्ता बन साधक अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियों में ब्रह्मगन्ध, ब्रह्मरस, ब्रह्मतेज, ब्रह्मयश तथा ब्रह्मनाद का अनुभव करता है। तब ब्रह्मा जी उस ब्रह्मज्ञानी से प्रश्न करते हैं-'तुम कौन हो?' उस समय ब्रह्मा जी द्वारा पूछे गये प्रश्नों का उत्तर ब्रह्मज्ञानी को इस प्रकार देना चाहिए—
'मैं वसन्त ऋतु-रूप, स्वयं प्रकाश परब्रह्म का ही अंश हूं। जो आप हैं, वही मैं हूं।' इस पर ब्रह्माजी पूछते हैं-'मैं कौन हूं?'
ब्रह्मवेत्ता उत्तर देता है-'आप सत्य हैं।'
ब्रह्मा जी पूछते हैं-'जिसे तुम सत्य कहते हो, वह क्या है?'
ब्रह्मवेत्ता का उत्तर-'जो समस्त देवताओं एवं प्राणों से भी सर्वथा भिन्न एवं विशेष लक्षणों से युक्त है, वह 'सत्' है और जो देवता प्राणस्वरूप है, वह 'त्य' है। वाणी के द्वारा जिस तत्त्व को 'सत्य' कहते हैं, वह यही है। यह और आप सभी कुछ हैं। अत: आप ही 'सत्य' हैं।'
ब्रह्मा जी पूछते हैं-'तुम मेरे पुरुषवाचक नामों को किससे ग्रहण करते हो?'
साधक का उत्तर-'प्राण से।'
ब्रह्मा जी का प्रश्न-'स्त्रीवाचक नामों को किससे ग्रहण करते हो?'
साधक का उत्तर-'वाणी से।'
प्र.-'नपुंसकवाची नामों को किससे ग्रहण करते हो?'
उ.-'मन से।'
प्र.-'गन्ध का अनुभव किससे करते हो?'
उ.-'प्राण से- घ्राणेन्द्रिय से।'
प्र.–'रूपों को किससे ग्रहण करते हो?'
उ.-'नेत्रों से।'
प्र.-'शब्दों को किससे सुनते हो?'
उ.-'कानों से।'
प्र.-'अन्न का आस्वादन किससे करते हो?'
उ.-'जिह्वा से।'
प्र.-'कर्म किससे करते हो?'
उ.-'हाथों से।'
प्र.-'सुख-दु:ख का अनुभव किससे करते हो?'
उ.-'शरीर से।'
प्र.-'रति का आनन्द एवं प्रजोत्पत्ति का सुख किससे उठाते हो?'
उ.-'उपस्थ से, अर्थात् इन्द्री से।'
प्र.-'गमन-क्रिया किससे करते हो?'
उ.-'दोनों पैरों से।'
प्र.-'बुद्धि-वृत्तियों को, ज्ञातव्य विषयों को और मनोरथों को किससे ग्रहण करते हो?'
उ.-'प्रज्ञा से।'
इस प्रकार ब्रह्मा जी के सभी प्रश्नों का उत्तर देने के उपरान्त स्वयं ब्रह्मा जी साधक से कहते हैं कि 'जल' आदि प्रसिद्ध पांच महाभूत मेरे स्थान हैं। अत: यह मेरा लोक भी जल आदि तत्त्व द्वारा प्रधान है। तुम मुझसे अभिन्न मेरे उपासक हो। अत: यह तुम्हारा भी लोक है।'
इस प्रकार वह साधक ब्रह्मा की 'जिति' (विजय प्राप्त करने की शक्ति) और 'व्यष्टि' (सर्वव्यापक शक्ति), दोनों को प्राप्त कर लेता है।'
महर्षि चित्र ने इस प्रकार 'ब्रह्मज्ञान' का उपदेश देकर गौतम ऋषि को अभिभूत किया। ऋषि गौतम अपने पुत्र श्वेतकेतु के साथ महर्षि चित्र को प्रणाम करके वापस लौट गये।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. अर्थात् हे सूर्यदेव! संसार को तृणवत त्याग देने से तुम वर्ग कहलाते हो। प्रभु! मेरे पापों को मुझसे दूर करो।
  2. अर्थात् हे सूर्यदेव! तुम उद्वर्ग कहे जाते हो। अत: मेरे पापों को नष्ट करो।
  3. अर्थात- हे सूर्यदेव! तुम संवर्ग कहलाते हो। अत: मेरे पापों को दूर करो।
  4. अर्थात् हे सोम मण्डल की अधिष्ठात्री देवी! अतिसुन्दर भावनाओं से युक्त आपका हृदय, जो पूर्ण आनन्दमय स्वरूप है, चन्द्रमण्डल में विद्यमान है। उसके द्वारा आप अमृतत्त्व पद पर भी अधिकार रखने वाली हैं। आप मुझ पर ऐसी कृपा करें, जिससे मुझे कभी पुत्रशोक से व्यथित होकर रोना न पड़े।
  5. इसका अर्थ यही है कि हे सुन्दर मांग वाली सुन्दरी! तुम सोम रूप वाली हो। तुम्हारा हृदय प्रजा (सन्तति) का पालक है। उसके अन्दर सोममण्डल की भांति जो अमृत-राशि है, अर्थात् दूध भरा हुआ है, उसे म् जानता हूं। इस सत्य के प्रभाव से मैं कभी पुत्रशोक से न रोऊं, मुझ पर ऐसी कृपा करो।
  6. 'प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा।'-(कौषी.3 अध्याय 2


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