वैदिक वाङ्मय का शास्त्रीय स्वरूप  

वैदिक वाङ्मय का शास्त्रीय स्वरूप
संस्कृत साहित्य की शब्द-रचना की दृष्टि से 'वेद' शब्द का अर्थ ज्ञान होता है, परंतु इसका प्रयोग साधारणतया ज्ञान के अर्थ में नहीं किया जाता। हमारे महर्षियों ने अपनी तपस्या के द्वारा जिस 'शाश्वत ज्योति' का परम्परागत शब्द-रूप से साक्षात्कार किया, वही शब्द-राशि 'वेद' है। वेद अनादि हैं और परमात्मा के स्वरूप हैं। महर्षियों द्वारा प्रत्यक्ष दृष्ट होने के कारण इनमें कहीं भी असत्य या अविश्वास के लिये स्थान नहीं है। ये नित्य हैं और मूल में पुरुष-जाति से असम्बद्ध होने के कारण अपौरुषेय कहे जाते हैं।

प्रामाणिकता

वेद अनादि अपौरुषेय और नित्य हैं तथा उनकी प्रामाणिकता स्वत: सिद्ध है, इस प्रकार का मत आस्तिक सिद्धान्तवाले सभी पौराणिकों एवं सांख्य, योग, मीमांसा और वेदान्त के दार्शनिकों का है। न्याय और वैशेषिक के दार्शिनकों ने वेद को अपौरुषेय नहीं माना है, पर वे भी इन्हें परमेश्वर (पुरुषोत्तम)- द्वारा निर्मित, परंतु पूर्वानुरूपी का ही मानते हैं। इन दोनों शाखाओं के दार्शनिकों ने वेद को परम प्रमाण माना है और आनुपूर्वी (शब्दोच्चारणक्रम)- को सृष्टि के आरम्भ से लेकर अब तक अविच्छिन्न-रूप से प्रवृत्त माना है।


जो वेद को प्रमाण नहीं मानते, वे आस्तिक नहीं कहे जाते। अत: सभी आस्तिक मतवाले वेद को प्रमाण मानने में एकमत हैं, केवल न्याय और वैशेषिक दार्शनिकों की अपौरुषेय मानने की शैली भिन्न है। नास्तिक दार्शनिकों ने वेदों को भिन्न-भिन्न व्यक्तियों द्वारा रचा हुआ ग्रन्थ माना है। चार्वाक मतवालों ने तो वेद को निष्क्रिय लोगों की जीविका का साधन तक कह डाला है। अत: नास्तिक दर्शन वाले वेद को न तो अनादि न अपौरुषेय, और न नित्य ही मानते हैं तथा न इनकी प्रामणिकता में ही विश्वास करते हैं। इसीलिये वे नास्तिक कहलाते हैं। आस्तिक दर्शनशास्त्रों ने इस मत का युक्ति, तर्क एवं प्रमाण से पूरा खण्डन किया है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. पुत्र पिता के अनुकूल कर्म करने वाला हो और माता के साथ समान मन वाला हो। पत्नी पति से मधुर और सुखद वाणी बोले।(अथर्व 3।30।2

साभार:डा. श्रीश्रीकिशोरजी मिश्र

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