आपस्तम्ब धर्मसूत्र  

आपस्तम्बीय कल्प के 30 प्रश्नों में से 28वें तथा 29वें प्रश्नों को आपस्तम्ब धर्मसूत्र नाम से अभिहित किया जाता है। ये दोनों प्रश्न 11–11 पटलों में विभक्त है, जिनमें क्रमशः 32 और 29 कण्डिकायें प्राप्त हैं।

रचयिता

यही एक कल्पसूत्र है जिसकी श्रौत, गृह्य, धर्म और शुल्बसूत्र युक्त पूर्ण कल्प–परम्परा उपलब्ध है; पर उन सभी का कर्त्ता एक ही है या नहीं, यह कहना कठिन है। महामहोपाध्याय पाण्डुरंग वामन काणे के मतानुसार गृह्यसूत्र और धर्मसूत्र इन दोनों के प्रणेता एक ही हैं। स्मृतिचन्द्रिका इन दोनों को ही एक ग्रन्थकार की कृति मानती है। ब्यूह्लर तथा फूय्हरर् को भी इस विषय में कोई शंका नहीं है।[1] किन्तु ओल्डेनबर्ग के अनुसार आपस्तम्ब श्रौतसूत्र तथा आपस्तम्ब धर्मसूत्र के रचयिता भिन्न–भिन्न व्यक्ति हैं।[2] बौधायन धर्मसूत्र के कई अंशों का आपस्तम्ब धर्मसूत्र से सादृश्य हैं किन्तु यह कहना कठिन है कि किसने किसकी सामग्री ली है। महामहोपाध्याय काणे आपस्तम्ब धर्मसूत्र को बौधायन से परवर्ती मानते हैं। इस विषय में बनर्जी ने सुदीर्घ आलोचना की है। इससे ज्ञात होता है कि उन्होंने दोनों ग्रंथों की मन्त्र–सम्पत्ति की तुलनात्मक समीक्षा की है।

आपस्तम्ब धर्मसूत्र का सम्बन्ध दक्षिण भारत से प्रतीत होता है, क्योंकि चरण–व्यूहगत 'महार्णव' नामक रचना से उद्धृत पद्यों के अनुसार आपस्तम्ब शाखा नर्मदा के दक्षिण में प्रचलित थी।[3] स्वयं आपस्तम्ब ने धर्मसूत्रगत श्राद्ध के प्रकरण में ब्राह्मणों के हाथ में जल गिराने की प्रथा 'उत्तर के लोगों में' प्रचलित है, ऐसा कहकर दक्षिण भारतीय होने का परिचय दिया है। इस विषय में उल्लेखनीय तथ्य तो यह है कि आपस्तम्ब धर्मसूत्र में तैत्तिरीय आरण्यक के जिन मन्त्रों का निर्देश है, वे आन्ध्रपाठ से ही गृहीत हैं। इसी आधार पर ब्यूह्लर आपस्तम्ब को आन्ध्र–प्रदेशीय मानते हैं।[4]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. एस. बी. ई. भाग 2, भूमिका पृ. 13 15
  2. एस. बी. ई. भाग 30, भूमिका पृ. 32
  3. 'नर्मदा दक्षिणे भागे आपस्तम्ब्याश्वलायनी। राणायणी पिप्पला च यज्ञकन्याविभागिनः।। माध्यन्दिनी शंखायनी कौथुमी शौनकी तथा।' चरणव्यूह–महार्णव
  4. एस. बी. ई. भाग 2, भूमिका
  5. हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र, पृष्ठ 43 पर
  6. हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र, पृष्ठ 37
  7. हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र, भाग 1. पृष्ठ 45
  8. आपस्तम्ब धर्मसूत्र 1–1–4–8
  9. पूर्वमीमांसा 1–3–3
  10. आपस्तम्ब धर्मसूत्र 2–4 8–13 तथा पू. मी. 1–3–11, 14।
  11. आपस्तम्ब धर्मसूत्र 2–6–14–23
  12. पू. मी. 6–7–3
  13. आपस्तम्ब धर्मसूत्र 1–17–30
  14. आपस्तम्ब धर्मसूत्र 1–9–27–10
  15. 1–6–18–22
  16. आपस्तम्ब धर्मसूत्र 2–5–11–17, 20, 2–5–12–1, 2
  17. आपस्तम्ब धर्मसूत्र 2–29
  18. आपस्तम्ब धर्मसूत्र 1–1–6
  19. आपस्तम्ब धर्मसूत्र 1–5–9
  20. आपस्तम्ब धर्मसूत्र 2–7–1
  21. आपस्तम्ब धर्मसूत्र – सगोत्राय दुहितरं न प्रयच्छेत् 2–11–15।
  22. आपस्तम्ब धर्मसूत्र – धर्म प्रजासम्पन्ने दारे नाऽन्यां कुर्वीत 2–11–12।
  23. आपस्तम्ब धर्मसूत्र 2–16–19
  24. आपस्तम्ब धर्मसूत्र 2–27–17
  25. श्रुतिर्हि बलीयस्यानुमानिकादाचारात् – आपस्तम्ब धर्मसूत्र 1–4–8।
  26. हिन्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र – काणेकृत पृष्ठ 43

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