नृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद  

  • अथर्ववेदीय यह उपनिषद देवगण एवं प्रजापति के बीच प्रश्नोत्तर के रूप 'साकार' और 'निराकार' ब्रह्म का निरूपण करता है।
  • यह उपनिषद पांच खण्डों में विभक्त है।
  • ये पांचों खण्ड 'उपनिषद' नाम से ही जाने जाते हैं।
  • इनमें परमात्मा को परमपुरुषार्थी नृसिंह-रूप में व्यक्त किया गया है।
  • इस परमपुरुषार्थी परमपुरुष के तप से ही सृष्टि विकसित हुई है।
  • सृष्टि-विकास के क्रम को स्पष्ट करने वाले उपनिषद को 'पूर्वतापिनी' कहा जाता है।

प्रथम उपनिषद

पहला खण्ड
इसमें सृष्टि-रचना के उद्देश्य से ब्रह्मा जी तप करते हैं उस तप के प्रभाव से अनुष्टप छन्द द्वारा आबद्ध नारसिंह मन्त्रराज का जन्म होता है। उस मन्त्रराज के द्वारा ब्रह्मा जी सृष्टि की रचना करते हैं। सम्पूर्ण भूतों की उत्पत्ति इस अनुष्टप मन्त्र द्वारा ही होती है। सृष्टि के आदि में 'आप:' (मूल क्रियाशील तत्त्व, जो जल के रूप में था) से ही सृष्टि का सृजन माना जाता है।
अनुष्टुप छन्द
इस छन्द में चार चरण होते हैं। इसका अर्थ काव्यात्मक विशेष गठन से माना जाता है। इसका दूसरा अर्थ, जो आच्छादित किये हुए है। अनुष्टप छन्द के चार चरणों की भांति, सृष्टि की विविध विकास धाराएं चार-चार चरणों में ही व्यक्त हुई हैं, यथा- चार वेद, चार प्रकार के प्राणी- स्वेदज, अण्डज, जरायुज और उद्भिज, अन्त:करण के चार केन्द्र, चार वर्ण, चार आश्रम। इस 'अनुष्टुप' के द्वारा ही समस्त भूतों को जीवन धारण करने की शक्ति मिलती हैं।
सृष्टि के चार चरण

  • प्रथम चरण में, पृथ्वी और समुद्र, द्वितीय चरण में, यक्ष, गन्धर्व और अप्सराओं से सेवित अन्तरिक्ष, तीसरे चरण में, वसु, रुद्र, आदित्य, अग्नि आदि देवताओं से सेवित द्युलोक और चौथे चरण में, निर्मल, पवित्र, परम व्योम-रूप परमात्मा बना, ऐसा माना जाता है।
  • मन्त्रराज आनुष्टुप में, उग्रम् प्रथम चरण का आदि अंश है। ज्वलम दूसरे चरण का आदि अंश है। नृसिंह तीसरे चरण का आदि अंश हैं और मृत्यु चौथे चरण का आदि अंश है।
  • ये चारों पर 'साम' के ही स्वरूप हैं। वेदमन्त्रों में सबसे पहले 'ॐ' कार (प्रणव) का उच्चारण किया जाता है। इस प्रकार प्रणव को 'साम' का अंग स्वीकार करने वाला तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर लेता है।

ब्रह्मा जी ने कहा-'क्षीरसागर में शयन करने वाले भगवान नृसिंह-रूप हैं, वे सभी जीवात्माओं में तेज़ सिचिंत करने वाले हैं। उन नृसिंह-रूप ब्रह्म का ध्यान करके जीव मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। भगवान नृसिंह ही सर्वान्तर्याती और सर्वव्यापी परमात्मा हैं।'

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