वैदिक धर्म  

वैदिक धर्म
ओम
विवरण 'वैदिक धर्म' वैदिक सभ्यता का मूल धर्म था। यह हज़ारों वर्षों से भारतीय उपमहाद्वीप और मध्य एशिया में चला रहा है। आधुनिक 'सनातन धर्म' या हिन्दू धर्म इसी धार्मिक व्यवस्था पर आधारित है।
देवी-देवता ब्रह्मा, इन्द्र, अग्निदेव, वरुण देवता, सोम देवता, अश्विनीकुमार, पूषण, विष्णु, रुद्र, मित्र, त्वष्द्रा, विवस्तान, पृथ्वी देवी, अरण्यानी आदि।
विश्वास और दर्शनशास्त्र पुनर्जन्म, पूजा, भक्ति, संस्कार, पितर, दर्शन, हिन्दू धर्म, वेदान्त, योग, आयुर्वेद
ग्रंथ वेदसंहिता, वेदांग, ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक, उपनिषद, श्रीमद्भगवद गीता, रामायण, महाभारत, सूत्र, पुराण
संबंधित लेख हिन्दू धर्म संस्कार, यज्ञ, श्राद्ध
अन्य जानकारी वैदिक धर्म के देव समूह में सर्वप्रधान देवता कौन था, यह निर्धारित करना कठिन है। ऋग्वैदिक ऋषियों ने जिस समय जिस देवता की स्तुति की, उसे ही सर्वोच्च मानकर उसमें सम्पूर्ण गुणों का अरोपण कर दिया।

वैदिक धर्म कर्म पर आधारित था। यह धर्म पूर्णतः प्रतिमार्गी है। वैदिक देवताओं में पुरुष भाव की प्रधानता है। अधिकांश देवताओं की अराधना मानव के रूप में की जाती थी, किन्तु कुछ देवताओं की आराधना पशु के रूप में भी की जाती थी। 'अज एकपाद' और 'अहितर्बुध्न्य' दोनों देवताओं की परिकल्पना पशु के रूप में की गई है। मरुतों की माता की परिकल्पना 'चितकबरी गाय' के रूप में की गई है। इन्द्र की गाय खोजने वाला 'सरमा' (कुतिया) श्वान के रूप में है। इसके अतिरिक्त इन्द्र की कल्पना 'वृषभ' (बैल) के रूप में एवं सूर्य की 'अश्व' के रूप में की गई है। ऋग्वेद में पशुओं की पूजा का प्रचलन नहीं था। ऋग्वैदिक देवताओं में किसी प्रकार का उँच-नीच का भेदभाव नहीं था। वैदिक ऋषियों ने सभी देवताओं की महिमा गाई है। ऋग्वैदिक लोगों ने प्राकृतिक शक्तियों का 'मानवीकरण' किया है। इस समय 'बहुदेववाद' का प्रचलन था। ऋग्वैदिक आर्यो की देवमण्डली तीन भागों में विभाजित थी-

  1. आकाश के देवता - सूर्य, द्यौस, वरुण, मित्र, पूषन, विष्णु, उषा, अपांनपात, सविता, त्रिप, विंवस्वत, आदिंत्यगग, अश्विनद्वय आदि।
  2. अन्तरिक्ष के देवता - इन्द्र, मरुत, रुद्र, वायु, पर्जन्य, मातरिश्वन्, त्रिप्रआप्त्य, अज एकपाद, आप, अहिर्बुघ्न्य।
  3. पृथ्वी के देवता- अग्नि, सोम, पृथ्वी, बृहस्पति, तथा नदियां।

इस देव समूह में सर्वप्रधान देवता कौन था, यह निर्धारित करना कठिन है। ऋग्वैदिक ऋषियों ने जिस समय जिस देवता की स्तुति की उसे ही सर्वोच्च मानकर उसमें सम्पूर्ण गुणों का अरोपण कर दिया। मैक्समूलर ने इस प्रवृत्ति की 'हीनाथीज्म' कहा है। सूक्तों की संख्या की दृष्टि यह मानना न्यायसंगत होगा कि इनका सर्वप्रधान देवता इन्द्र था।

इन्द्र

  • ऋग्वेद में अन्तरिक्ष स्थानीय 'इन्द्र' का वर्णन सर्वाधिक प्रतापी देवता के रूप में किया गया है।
  • ऋग्वेद के क़रीब 250 सूक्तों में इनका वर्णन है।
  • इन्द्र को वर्षा का देवता माना जाता था। उन्होंने वृक्ष राक्षस को मारा था इसीलिए उन्हें 'वृत्रहन' कहा जाता है।
  • अनेक किलों को नष्ट कर दिया था, इस रूप में वे 'पुरन्दर' कहे जाते हैं।
  • इन्द्र ने वृत्र की हत्या करके जल का मुक्त करते हैं इसलिए उन्हें 'पुर्मिद' कहा गया।
  • इन्द्र के लिए एक विशेषण 'अन्सुजीत' (पानी को जीतने वाला) भी आता है।
  • इन्द्र के पिता 'द्योंस' हैं, 'अग्नि' उसका यमज भाई है और 'मरुत' उसका सहयोगी है।
  • विष्णु ने वृत्र के वध में इन्द्र की सहायता की थी।
  • ऋग्वेद में इन्द्र को समस्त संसार का स्वामी बताया गया है। उसका प्रिय आयुद्ध 'बज्र' है इसलिए उन्हें 'बज्रबाहू' भी कहा गया है।

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