आरण्यक साहित्य  

Disamb2.jpg आरण्यक एक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- आरण्यक (बहुविकल्पी)

ब्राह्मण ग्रन्थ के जो भाग अरण्य में पठनीय हैं, उन्हें 'आरण्यक' कहा गया या यों कहें कि वेद का वह भाग, जिसमें यज्ञानुष्ठान-पद्धति, याज्ञिक मन्त्र, पदार्थ एवं फलादि में आध्यात्मिकता का संकेत दिया गया, वे 'आरण्यक' हैं। जो मनुष्य को आध्यात्मिक बोध की ओर झुका कर सांसारिक बंधनों से ऊपर उठते हैं। वानप्रस्थाश्रम में संसार-त्याग के उपरांत अरण्य में अध्ययन होने के कारण भी इन्हें 'आरण्यक' कहा गया। आरयण्कों में दार्शनिक एवं रहस्यात्मक विषयों यथा, आत्मा, मृत्यु, जीवन आदि का वर्णन होता है। इन ग्रंथों को आरयण्क इसलिए कहा जाता है क्योंकि इन ग्रंथों का मनन अरण्य अर्थात् वन में किया जाता था। ये ग्रन्थ अरण्यों (जंगलों) में निवास करने वाले सन्न्यासियों के मार्गदर्शन के लिए लिखे गए थै। आरण्यकों में ऐतरेय आरण्यक, शांखायन्त आरण्यक, बृहदारण्यक, मैत्रायणी उपनिषद् आरण्यक तथा तवलकार आरण्यक (इसे जैमिनीयोपनिषद् ब्राह्मण भी कहते हैं) मुख्य हैं। ऐतरेय तथा शांखायन ऋग्वेद से, बृहदारण्यक शुक्ल यजुर्वेद से, मैत्रायणी उपनिषद् आरण्यक कृष्ण यजुर्वेद से तथा तवलकार आरण्यक सामवेद से सम्बद्ध हैं। अथर्ववेद का कोई आरण्यक उपलब्ध नहीं है। आरण्यक ग्रन्थों में प्राण विद्या मी महिमा का प्रतिपादन विशेष रूप से मिलता है। इनमें कुछ ऐतिहासिक तथ्य भी हैं, जैसे- तैत्तिरीय आरण्यक में कुरू, पंचाल, काशी, विदेह आदि महाजनपदों का उल्लेख है।

वेद एवं संबंधित आरयण्क

वेद सम्बन्धित आरण्यक

1- ऋग्वेद

ऐतरेय आरण्यक, शांखायन आरण्यक या कौषीतकि आरण्यक

2- यजुर्वेद

बृहदारण्यक, मैत्रायणी, तैत्तिरीयारण्यक

3- सामवेद

जैमनीयोपनिषद या तवलकार आरण्यक

4- अथर्ववेद

कोई आरण्यक नहीं

आरण्यक–साहित्य की पृष्ठभूमि

स्थूल के विरुद्ध सूक्ष्म के प्रति आकर्षण स्वभावतः उत्पन्न हो जाता है। श्रौतयागों के सन्दर्भ में भी, जनमानस में, विशेष रूप से प्रबृद्ध वर्ग में, इसी प्रकार का आकर्षण शनैःशनैः उत्तरोत्तर अभिवृद्ध हुआ। यज्ञ के द्रव्यात्मक स्वरूप के बहुविध स्वरूप–विस्तार में, जब उसका वास्तविक मर्म ओझल होने लगा, तो यह आवश्यकता गहराई से अनुभव की गई कि श्रौतयागों की आध्यात्मिक व्याख्या की जाए। ब्राह्मण ग्रन्थों के उत्तरार्ध में, इसी दृष्टिकोण को प्रधानता प्राप्त हुई और उसमें वैदिक यागों के अन्तर्तम में निहित गम्भीर अर्थवत्ता, वास्तविक मर्म और आध्यात्मिक रहस्यों के सन्धान के लिए जिस चिन्तन को आकार मिला, उसी का नामकरण आरण्यक–साहित्य के रूप में हुआ। आरण्यक ग्रन्थ ब्राह्मण ग्रन्थों एवं उपनिषदों के मध्य की कड़ी है। उपनिषदों में जिन आध्यात्मिक तत्त्वों को हम अत्युच्च शिखर पर आरूढ़ देखते हैं, उनकी पृष्ठभूमि आरण्यकों में ही निहित है। वेदोक्त सामाजिक व्यवस्था में, आश्रम–प्रणाली का विशेष महत्त्व है। ब्राह्मणग्रन्थोक्त श्रौतयागों के अनुष्ठान के अधिकारी गृहस्थाश्रमी माने गए हैं। इसके पश्चात् वानप्रस्थाश्रम में प्रविष्ट व्यक्तियों के लिए, वैदिक वाङ्मय में, आरण्यक–साहित्य विशेष उपादेय समझा गया है। पचास वर्ष से अधिक अवस्था वाले ऐसे व्यक्तियों में जो श्रौतायोगों के स्थूल द्रव्यात्मक स्वरूप से सुपरिचित थे, अब इस स्वरूप के वास्तविक मर्म की जिज्ञासा स्वभावतः अधिक थी। इन्हीं की बौद्धिक जिज्ञासाओं के शमन के लिए आरण्यक–साहित्य का प्रणयन हुआ।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 3.7.7.7.16
  2. श्लोक, 6
  3. श्लोक, 9
  4. ग्रामे मनसा स्वाध्यायमधीयीत दिवा नक्तं उतारण्येऽबल उत वाचोत तिष्ठन्नुत व्रजन्नुतासीन उत शयानोऽधीयीतैव स्वाध्यायमा–तैत्तिरीयारण्यक 2.12.2
  5. य एवं विद्वान् महारात्र उषस्युदिते व्रजंस्तिष्ठन्नासीनः शयानोऽरण्ये ग्रामे वा यावत्ररसं स्वाध्यायमधीते सर्वाल्लोकां जयति सर्वाल्लोकाननृणोऽनुसञ्वरित। –वही 2.15.1
  6. A Further development are the AranyaKas or 'forest treatises' the later age of which is indicated both by the position they occupy at the end of the Brahmanas and by their theosophical character. These works are generally represented as meant for the use of pious men who have retired to the forest and no longer perform sacrifices. According to the view of Prof. oldenberg they are, however rather treatises, which, owing to the superior to mystic sanctity of their contents, were intended to be communicated to the pupil by his teacherऽ—मैकडानल, हि. सं. लि., पृ. 172-73
  7. 'नवनीतं यथा दध्नो मलयाच्चन्दनं यथा।
    आरण्यकं च वेदेभ्य औषधिभ्योऽमृतं यथा (331.3)।।

  8. भारतीय दर्शन, प्रथम भाग, पृष्ठ 59
  9. निरुक्त–भाष्य (1.4
  10. गोपथ ब्राह्मण (2.10
  11. ॠग्वेद, 6.164.31;1.164.38
  12. वैदिक साहित्य और संस्कृति, (पंचम संस्करण) पृष्ठ 234-35
  13. तैत्तिरीय–आरण्यक. 1.2
  14. ऐतरेय आरण्यक, 2.1.6
  15. ऐतरेय आरण्यक 2.1.7
  16. ऐतरेय आरण्यक 2.2.2
  17. मै. आरण्यक 6.9
  18. 'प्रसृतो ह वै यज्ञोपवीतिनो यज्ञोऽपसृतोऽनुपवीतिनो यत्किञ्च ब्राह्मणो यज्ञोपवीत्यधीते यजत एव तत्' (2.1.1
  19. 'वातरशना ह वा ऋषयः श्रमणा ऊर्ध्वमन्थिनो बभूवुस्तानृषयोऽर्थमायंस्ते
    निलायमचरँस्तेऽनुप्रविशुः कूष्माण्डनि ताँस्तेष्वन्वविन्दञ्छ्रद्धया च तपसा च' (2.7.1)।

  20. 'ऐतमेव विदित्वा मुनिर्भवति।
    एवमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति' (4.4.22)।

  21. ऐतरेय–आरण्यक, (2.1.8
  22. ऐतरेय–आरण्यक (कीथ–सम्पादित तथा अनुदित) पृष्ठ 210
  23. भाष्योपक्रमणिका, श्लोक 10-11
  24. 'नमो गंगायमुनयोर्मध्ये ये वसन्ति ते मे प्रसन्नात्मानश्चिरं जीवितं वर्धयन्ति नमो गंगायमुनयोमुर्निभ्यश्च' (तैत्तिरीयारण्यक 2.20
  25. 'अथ ह वै गार्ग्यो बालाकिरनूचानः संस्पृष्ट आस सोऽवसदुशीनरेषु स वसन्मत्स्येषु कुरुपञ्चालेषु काशिविदेहेष्विति' (6.1
  26. मैत्रायणीय–आरण्यक 6.9

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