उत्तर मीमांसा  

उत्तर मीमांसा भारतीय दर्शनों में से एक है। इसे 'शारीरिक मीमांसा' और 'वेदांतदर्शन' भी कहते हैं। हिन्दू चिन्तन की छ: प्रणालियाँ प्रचलित हैं। वे 'दर्शन' कहलाती हैं, क्योंकि वे विश्व को देखने और समझने की दृष्टि या विचार प्रस्तुत करती हैं। उनके तीन युग्म हैं, क्योंकि प्रत्येक युग्म में कुछ विचारों का साम्य परिलक्षित होता है। पहला युग्म मीमांसा कहलाता है, जिसका सम्बन्ध वेदों से है। ये नाम बादरायण के बनाए हुए 'ब्रह्मसूत्र' नामक ग्रंथ के हैं। 'मीमांसा' शब्द का अर्थ है- अनुसंधान, गंभीर, विचार, खोज। प्राचीन भारत में वेदों को परम प्रमाण माना जाता था। वेद वाङ्‌मय बहुत विस्तृत है और उसमें यज्ञ, उपासना और ज्ञान संबंधी मंत्र पाए जाते हैं। वे मंत्र (संहिता), ब्रह्मण और आरण्यक, उपनिषद नामक भागों में विभाजित किए गए हैं।[1]

पूर्व मीमांसा

प्राचीन[2]होने के कारण वेद वाक्यों के अर्थ, प्रयोग और परस्पर संबंध समन्वय का ज्ञान लुप्त हो जाने से उनके संबंध में अनुसंधान करने की आवश्यकता पड़ी थी। मंत्र और ब्राह्मण भागों के अंतर्गत वाक्यों का समन्वय जैमिनि ने अपने ग्रंथ 'मीमांसासूत्र' (पूर्वमीमांसादर्शन) में किया था। मंत्र और ब्रह्मण वेद के पूर्वभाग होने के कारण उनके अर्थ और उपयोग की मीमांसा का नाम 'पूर्वमीमांसा' पड़ा है। वेद के याज्ञिक रूप (कर्मकाण्ड) के विवेचन का शास्त्र है।[1]

वेदान्त

वेद के उत्तर भाग 'आरण्यक' और 'उपनिषद' के वाक्यों का समन्वय बादरायण ने 'ब्रह्मसूत्र' नामक ग्रंथों में किया था। अत: उसका नाम 'उत्तरमीमांसा' पड़ा। उत्तर मीमांसा 'शारीरिक मीमांसा' भी इस कारण कहलाता है कि इसमें शरीरधारी आत्मा के लिए उन साधनों और उपासनाओं का संकेत है, जिनके द्वारा वह अपने ब्रह्मत्व का अनुभव कर सकता है। इसका नाम 'वेदांतदर्शन' इस कारण पड़ा कि इसमें वेद के अंतिम भाग के वाक्यों के विषयों का समन्वय किया गया है। इसका नाम 'ब्रह्ममीमांसा' अथवा 'ब्रह्मसूत्र' इस कारण पड़ा कि इसमें विशेष विषय ब्रह्म और उसके स्वरूप की मीमांसा है, जबकि पूर्वमीमांसा का विषय यज्ञ और धार्मिक कृत्य हैं।

दार्शनिक इतिहास

उत्तर मीमांसा का सम्बन्ध भारत के सम्पूर्ण दार्शनिक इतिहास से है। उत्तर मीमांसा के आधारभूत ग्रन्थ को 'वेदान्तसूत्र', 'ब्रह्मसूत्र' एवं 'शारीरकसूत्र' भी कहते हैं। क्योंकि इसका विषय परब्रह्म (आत्मा=ब्रह्म) है। 'वेदान्तसूत्र' वादरायण के रचे कहे गए हैं जो चार अध्यायों में विभक्त हैं। इस दर्शन का संक्षिप्त निम्नलिखित है-

ब्रह्म निराकार है, वह चेतन है, वह श्रुतियों का उदगम है एवं सर्वज्ञ है तथा उसे केवल वेदों के द्वारा ही जाना जा सकता है। वह सृष्टि का मौलिक एवं अन्तिम कारण है। उसकी कोई इच्छा नहीं है। एतदर्थ वह अकर्मण्य है, दृश्य जगत् उसकी लीला है। विश्व जो ब्रह्म द्वारा समय-समय पर उदभत होता है, उसका न आदि है और न अंत है। वेद भी अनंत हैं, देवता हैं, जो वेदविहित यज्ञों द्वारा पोषण प्राप्त करते हैं। जीव या व्यक्तिगत आत्मा आदि-अंतहीन है, चेतनायुक्त है, सर्वव्यापी है। यह ब्रह्म का ही अंश है; यह स्वयं ब्रह्म है। इसका व्यक्तिगत रूप केवल एक झलक है। अनुभव द्वारा मनुष्य ब्रह्म ज्ञान प्राप्त कर सकता है। ब्रह्म केवल 'ज्ञानमय' है, जो मनुष्य को मुक्ति दिलाने में समर्थ है। ब्रह्मचर्य पूर्वक ब्रह्म का चिन्तन, जैसा कि वेदों (उपनिषदों) में बताया गया है, सच्चे ज्ञान का मार्ग है। कर्म से कार्य को फल प्राप्त होता है और इसके लिए पुनर्जन्म होता है। ज्ञान से मुक्ति की प्राप्ति होती है।

अर्थ निरूपण

उत्तर मीमांसा में केवल वेद (आरण्यकों और उपनिषदों के) वाक्यों के अर्थ का निरूपण और समन्वय ही नहीं है, उसमें जीव, जगत् और ब्रह्म संबंधी दार्शनिक समस्याओं पर भी विचार किया गया है। एक सर्वांगीण दर्शन का निर्माण करके उसका युक्तियों द्वारा प्रतिपादन और उससे भिन्न मत वाले दर्शनों का खंडन भी किया गया है। दार्शनिक दृष्टि से यह भाग बहुत महत्वूपर्ण समझा जाता है। समस्त 'ब्रह्मसूत्र' में चार अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय में चार पाद हैं। प्रथम अध्याय में प्रथम पाद के प्रथम चार सूत्र और दूसरे अध्याय के प्रथम और द्वितीय पादों में वेदांत दर्शन संबंधी प्राय: सभी बातें आ जाती हैं। इनमें ही वेदांत दर्शन के ऊपर जो आक्षेप किए जा सकते हैं, वे और वेदांत को दूसरे दर्शनों में- पूर्वमीमांसा, बौद्ध, जैन, वैशेषिक, पाशुपत दर्शनों में, जो उस समय प्रचलित थे, जो त्रुटियाँ दिखाई देती हैं, वे आ जाती हैं।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 1.3 उत्तरमीमांसा (हिन्दी) भरतखोज। अभिगमन तिथि: 2 अगस्त, 2015।
  2. भारतीय विचार पद्धति के अनुसार अपौरुषेय

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