मैत्रेय्युग्पनिषद  

इस सामवेदीय उपनिषद में राजा बृहद्रथ और महातेजस्वी शाकायन्य मुनि के वार्तालाप द्वारा शरीर की नश्वरता, उसके वीभत्स रूप और आत्मतत्त्व की प्राप्ति का उल्लेख है। इसमें कुल तीन अध्याय हैं।
नित्य कौन हैं?

  • पहले अध्याय में राजा बृहद्रथ और शाकायन्य मुनि का वार्तालाप है, जिसमें शरीर की नश्वरता और 'आत्मतत्त्व' की प्राप्ति पर प्रकाश डाला गया है। मुनिवर राजा से कहते हैं कि परमात्मा अविनाशी है। उसे मन एवं वाणी से नहीं जाना जा सकता। वह आदि और अन्त से रहित है। वह मात्र सत्-रूपी प्रकाश से सतत प्रकाशित होता है। वह कल्पनातीत है-

नित्य: शुद्धो बुद्धमुक्तस्वभाव: सत्य: सूक्ष्म: संविभुश्चाद्वितीय:।
आनन्दाब्धिर्य: पर: सोऽहमस्मि प्रत्यग्धातुर्नात्र संशीतिरस्ति॥15॥ अर्थात वह परमात्मा नित्य, शुद्ध, ज्ञान-स्वरूप, मुक्त स्वभाव, सत्य-रूप, सूक्ष्म, सर्वत्र व्यापक और अद्वितीय है। वह इस परमानन्द सागर एवं प्रत्येक स्वरूप का धारण करने वाला है। इसमें कोई संशय नहीं है।
आत्मा ही नित्य है

  • दूसरे अध्याय में भगवान मैत्रेय और महादेव के वार्तालाप द्वारा 'परमतत्त्व' के रहस्य पर प्रकाश डाला गया है। महादेवजी कहते हैं-'यह शरीर देवालय है तथा उसमें रहने वाला जीव ही केवल शिव, अर्थात परमात्मा है।'

संबंधित लेख

श्रुतियाँ
और पढ़ें
"http://m.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=मैत्रेय्युग्पनिषद&oldid=598278" से लिया गया