अद्वयतारकोपनिषद  

शुक्ल यजुर्वेद के इस उपनिषद में 'राजयोग' का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इसका मुख्य ध्येय 'ब्रह्म' की प्राप्ति है। इसमें 'तारक योग' की व्याख्या, स्वरूप, लक्ष्य, विधि, सिद्धि, मुद्रा और फलश्रुति आदि के विषय में बताया गया है। इसमें बताया गया है कि 'तारक-ब्रह्म' की साधना से जीव भवसागर से पार हो सकता है।

कुण्डलिनी शक्ति

प्रारम्भ में बताया गया है कि योगी के शरीर के मध्य 'सुषुम्ना' नामक नाड़ी चन्द्रमा की भांति प्रकाशमान है। वह 'मूलाधार चक्र' से 'ब्रह्मरन्ध्र' तक विद्यमान है। इस नाड़ी के बीच में विद्युत के समान तेजोमयी सर्पिणी की भांति, कुण्डली मारे हुए, 'कुण्डलिनी शक्ति' विराजमान है। उस कुण्डलिनी शक्ति का ज्ञान होते ही साधक समस्त पापों से मुक्त होकर 'मोक्ष' का अधिकारी हो जाता है। मस्तिष्क के ऊपर स्थित तेजामय 'तारक-ब्रह्म' के साथ इस कुण्डलिनी शक्ति का योग होते ही साधक सिद्ध हो जाता है। भौतिक सुखों की कामना में रत मनुष्य निरन्तर पापकर्मों की ओर प्रवृत्त रहता है, परन्तु हृदय में कुण्डलिनी शक्ति का दर्शन करने मात्र से ही साधक श्रेष्ठतम आनन्द के स्रोत को अपने भीतर ही प्राप्त कर लेता है।

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