महोपनिषद  

सामवेदीय परम्परा से सम्बद्ध महोपनिषद श्रीनारायण के महान् स्वरूप को प्रकट करने वाला है। इसे शुकदेवजी और राजा जनक तथा ऋभु व निदाघ के प्रश्नोत्तर के रूप में लिखा गया है। इसमें कुल छह अध्याय है।

प्रथम अध्याय

'नारायण' का स्वरूप इस अध्याय में सर्वप्रथम श्रीनारायण के अद्वितीय ईश्वरीय स्वरूप का विवेचन है। उसके उपरान्त ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेंन्द्रियों का विवेचन है। फिर रुद्र की उत्पत्ति और ब्रह्मा के जन्म का कथानक है। देवताओं आदि का प्रादुर्भाव और नारायण के विराट स्वरूप का विवेचन है। इस विराट स्वरूप वाले नारायण को हृदय द्वारा ही पाया जा सकता है; क्योंकि वही इसका स्थान है।

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