श्रौतसूत्र  

ऋग्वेद के श्रौतसूत्र

ऋग्वेद के श्रौत सूत्र ग्रन्थ दो लघु पुस्तिकाओं (चरणों) से सम्बन्धित हैं—शांखायन और आश्वलायन, जिनमें शांखायन बाद में उत्तर गुजरात में स्थिर हो गया और आश्वलायन गोदावरी और कृष्णा के मध्य में दक्षिण भारत में स्थिर हुआ। अधिकतर दोनों एक ही क्रम से यज्ञ का वर्णन करते हैं। किन्तु बड़े राजकीय यज्ञों का शांखायन श्रौत–सूत्र में कहीं अधिक विस्तार से वर्णन किया गया है। शांखायन श्रौत सूत्र शांखायन ब्राह्मण से अत्यधिक निकटता के साथ सम्बद्ध है और दोनों ही में प्राचीनतर प्रतीत होता है। यह बात वस्तुतत्त्व और शैली दोनों दृष्टियों से सिद्ध होती हैं। ये दोनों (वस्तु और शिल्प) अनेक भागों में ब्राह्मण ग्रन्थों से मेल खाते हैं। इसमें 18 अध्याय हैं, जिनमें अन्तिम दो बाद में जोड़े गए और कौषतकी आरण्यक के प्रथम दो अध्यायों से मेल खाते हैं। आश्वालायन के श्रौतसूत्र में 12 अध्याय है, यह ऐतरेय ब्राह्मण से सम्बन्धित हैं। आश्वालायन ऐतरेय आरण्यक के चौथे काण्ड के रचयिता भी माने जाते हैं और परम्परा के अनुसार वे शौनक के शिष्य थे।

संबंधित लेख

श्रुतियाँ
और पढ़ें

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः



"http://m.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=श्रौतसूत्र&oldid=226230" से लिया गया