मनुस्मृति  

भारत में वेदों के उपरान्त सर्वाधिक मान्यता और प्रचलन ‘मनुस्मृति’ का ही है । इसमें चारों वर्णों, चारों आश्रमों, सोलह संस्कारों तथा सृष्टि उत्पत्ति के अतिरिक्त राज्य की व्यवस्था, राजा के कर्तव्य, भांति-भांति के विवादों, सेना का प्रबन्ध आदि उन सभी विषयों पर परामर्श दिया गया है जो कि मानव मात्र के जीवन में घटित होने सम्भव हैं यह सब धर्म-व्यवस्था वेद पर आधारित है। उसके उपरान्त इसके इतने संस्करण प्रकाशित हुए कि उनका नाम देना सम्भव नहीं है। इस ग्रंथ में निर्णयसागर के संस्करण एवं कुल्लूकभट्ट की टीका का उपयोग हुआ है। मनुस्मृति का अंग्रेज़ी अनुवाद कई बार हो चुका है। डॉ. बुहलर का अनुवाद सर्वश्रेष्ठ है। उन्होंने एक विद्वत्तापूर्ण भूमिका में कतिपय समस्याओं का उद्घाटन भी किया है।

रचना काल

मनुस्मृति का रचना काल ई.पू. एक हज़ार वर्ष से लेकर ई.पू. दूसरी शताब्दी तक माना जाता है। इसकी रचना के संबंध में कहा गया है कि धर्म, वर्ण और आश्रमों के विषय में ज्ञान प्राप्ति की इच्छा से ऋषिगण स्वायंभुव मनु के समक्ष उपस्थित हुए। मनु ने उनको कुछ ज्ञान देने के बाद कहा कि मैंने यह ज्ञान ब्रह्मा से प्राप्त किया था और मरीचि आदि मुनियों को पढ़ा दिया। ये भृगु (जो वहां उपस्थित थे) मुझसे सब विषयों को अच्छी तरह पढ़ चुके हैं और अब ये आप लोगों को बताएंगे। इस पर भृगु ने मनु की उपस्थिति में, उनका बताया ज्ञान, उन्हीं की शब्दावली में अन्यों को दिया। यही ज्ञान गुरु-शिष्य परंपरा में 'मनुस्मृति' या 'मनु-संहिता' के नाम से प्रचलित हुआ। भारत में मनुस्मृति का सर्वप्रथम मुद्रण 1813 ई. में कलकत्ता में हुआ था। 2694 श्लोकों का यह ग्रंथ 12 अध्यायों में विभक्त है। विभिन्न अध्यायों के वर्ण्य-विषय इस प्रकार हैं-

  1. वर्णाश्रम धर्म की शिक्षा,
  2. धर्म की परिभाषा,
  3. ब्रह्मचर्य, विवाह के प्रकार आदि,
  4. गृहस्थ जीवन,
  5. खाद्य-अखाद्य विचार तथा जन्म-मरण, अशौच और शुद्धि,
  6. वानप्रस्थ जीवन,
  7. राजधर्म और दंड,
  8. न्याय शासन,
  9. पति-पत्नी के कर्त्तव्य,
  10. चारों वर्णों के अधिकार और कर्त्तव्य,
  11. दान-स्तुति,प्रायश्चित्त आदि तथा
  12. कर्म पर विवेचन और ब्रह्म की प्राप्ति।

आस्तिक हिंदुओं के कार्य-व्यवहार का आधार दीर्घकाल तक मनुस्मृति रही हैं। इसका प्रभाव न्याय प्रणाली पर भी पड़ा है। मनु ने जन्म से लेकर मृत्यु तक का मनुष्य का पूरा कार्यक्रम प्रस्तुत किया है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ये चार पुरुषार्थ; देव, ऋषि और पितृ ये तीन ऋण; सोलह संस्कार, पांच महायज्ञ; चार आश्रम और चार वर्ण सभी का इसमें विवेचन है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. शान्ति, 21.12
  2. शान्ति, 59.43
  3. ऋग्वेद 1.80.16; 1.114.2; 2.33.13
  4. मा न: पथ: पित्र्यान्मानवादधि दूरं नैष्ट परावत:। ऋग्वेद, 8.30.3 ।
  5. 'यद्वै किं च मनुरवदत्तद् भेषजम्', -तै0 सं0 2.2.10.2; 'मनुर्वे यत्किंचावदत्तद् भेषजं भेषजतायै', - ताण्ड्य0 23.16.17
  6. शान्तिपर्व, 336.38-46
  7. शान्तिपर्व, 58.80-85
  8. मनुस्मृति, 1.32-33
  9. 1.58
  10. 1.59-60
  11. 5.1-2; 12.1-2
  12. 9.158, 10.78 आदि
  13. 8.139, 279; 9.239 आदि
  14. भार्गवीया नारदीयाबार्हस्पत्याङ्गिरस्यपि। स्वायंभुवस्य शास्त्रस्य चतस्त्र: संहिता भता:॥ चतुर्वर्ग0, दानखण्ड, पृ0 528; संस्कारमयूख, पृ0 2 ।
  15. याज्ञ0 पर भाष्य, 2.73,74, 83, 85, जहाँ मनु0 8,.68, 70-71, 380 एवं 105-6 क्रमश: स्वयंभू के नाम से उद्धृत हैं
  16. देखिए प्रकरण 13
  17. तुलना कीजिए- 'अलब्धलाभार्था लब्धपरिरक्षिणी रक्षितबिबर्धनी वृद्धस्य तीर्थेषु प्रतिपादिनी च।' कोटिल्य (1-4) और 'अलब्धर्मिच्छेद्दण्डेन लब्धं रक्षेदवेक्षया। रक्षितं वर्धयेद् वृद्धचा वृद्धं पात्रेषु निक्षिपेत्॥ मनु0 (7.101)।
  18. 11.33
  19. मृच्छकटिक, 9.39
  20. 3.54
  21. 2. 136
  22. याज्ञ0 पर, 1.69
  23. याज्ञ0 पर, 3.20

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