वेद का स्वरूप  

भारतीय मान्यता के अनुसार वेद सृष्टिक्रम की प्रथम वाणी है।[1] फलत: भारतीय संस्कृतिका मूल ग्रन्थ वेद सिद्ध होता है। पाश्चात्य विचारकों ने ऐतिहासिक दृष्टि अपनाते हुए वेद को विश्व का आदि ग्रन्थ सिद्ध किया। अत: यदि विश्वसंस्कृति का उद्गम स्तोत्र वेद को माना जाय तो कोई अत्युक्ति नहीं है।

वेद शब्द और उसका लक्षणात्मक स्वरूप

शाब्दिक विधा से विश्लेषण करने पर वेद शब्द की निष्पत्ति 'विद-ज्ञाने' धातु से 'घञ्' प्रत्यय करने पर होती है।

  • विचारकों ने कहा है कि-जिसके द्वारा धर्मादि पुरुषार्थ-चतुष्टय-सिद्धि के उपाय बतलाये जायँ, वह वेद है।[2]
  • आचार्य सायण ने वेद के ज्ञानात्मक ऐश्वर्य को ध्यान में रखकर लक्षित किया कि- अभिलषित पदार्थ की प्राप्ति और अनिष्ट-परिहार के अलौकिक उपायको जो ग्रन्थ बोधित करता है, वह वेद है।[3] यहाँ यह ध्यातव्य है कि आचार्य सायणने वेद के लक्षण में 'अलौकिकमुपायम्' यह विशेषण देकर वेदों की यज्ञमूलकता प्रकाशित की है।
  • आचार्य लौगाक्षि भास्कर ने दार्शनिक दृष्टि रखते हुए- अपौरुषेय वाक्य को वेद कहा है।[4]
  • आचार्य उदयन ने भी कहा है कि- जिसका दूसरा मूल कहीं उपलब्ध नहीं है और महाजनों अर्थात् आस्तिक लोगों ने वेद के रूप में मान्यता दी हो, उन आनुपूर्वी विशिष्ट वाक्यों को वेद कहते हैं।[5]
  • आपस्तम्बादि सूत्रकारों ने वेद का स्वरूपावबोधक लक्षण करते हुए कहा है कि- वेद मन्त्र और ब्राह्मणात्मक हैं।[6]
  • आचार्यचरण स्वामी श्रीकरपात्री जी महाराज ने दार्शनिक एवं याज्ञिक दोनों दृष्टियों का समन्वय करते हुए वेद का अद्भुत लक्षण इस प्रकार उपस्थापित किया है-' शब्दातिरिक्तं शब्दोपजीविप्रमाणातिरिक्तं च यत्प्रमाणं तज्जन्यप्रमितिविषयानतिरिक्तार्थको यो यस्तदन्यत्वे सति आमुष्मिकसुखजनकोच्चारणकत्वे सति जन्यज्ञानाजन्यो यो प्रमाणशब्दस्तत्त्वं वेदत्वम्।'[7]
  • उपर्युक्त लक्षणों की विवेचना करने पर यह तथ्य सामने आता है कि- ऐहकामुष्मिक फलप्राप्ति के अलौकिक उपाय का निदर्शन करने वाला अपौरुषेय विशिष्टानुपूर्वीक मन्त्र-ब्राह्मणात्मक शब्दराशि वेद है।

वेद के भाग

वेद के दो भाग मन्त्र और ब्राह्मण-

  • आचार्यों ने सामान्यतया मन्त्र और ब्राह्मण-रूप से वेदों का विभाजन किया है।[8]
  • इसमें मन्त्रात्मक वैदिक शब्दराशि का मुख्य संकलन संहिता के नाम से प्राचीन काल से व्यवहृत होता आया है।
  • संहितात्मक वैदिक शब्दराशि पर ही पदपाठ, क्रमपाठ एवं अन्य विकृतिपाठ होते हैं।
  • यज्ञों में संहितागत मन्त्रों का ही प्रधान रूप से प्रयोग होता है।[9]
  • आचार्य यास्क के अनुसार 'मन्त्र' शब्द मननार्थक 'मन्' धातु से निष्पन्न है।[10]
  • पाञ्चरात्र-संहिता के अनुसार मनन करने से जो त्राण करते हैं, वे मन्त्र हैं।[11]अथवा मत- अभिमत पदार्थ के जो दाता हैं, वे मन्त्र कहलाते हैं।
  • महर्षि जैमिनि ने मन्त्र का लक्षण करते हुए कहा है- 'तच्चोदकेषु मन्त्राख्या।'
  • इसी को स्पष्ट करते हुए आचार्य माधव का कथन है कि-याज्ञिक विद्वानों का 'यह वाक्य मन्त्र है'-ऐसा समाख्यान(- नाम निर्देश) मन्त्र का लक्षण है। तात्पर्य यह है कि याज्ञिक लोग जिसे मन्त्र कहें, वही मन्त्र है। वे याज्ञिक लोग अनुष्ठान के स्मारक आदि वाक्यों के लिये मन्त्र शब्द का प्रयोग करते हैं।[12]
  • आचार्य लौगाक्षि भास्करने, अनुष्ठान (प्रयोग)- से सम्बद्ध (समवेत) द्रव्य-देवतादि (अर्थ) का जो स्मरण कराते हैं, उन्हें मन्त्र कहा है। [13] इस प्रकार तत्तत् वैदिक कर्मों के अनुष्ठान काल में अनुष्ठेय क्रिया एवं उसके अंगभूत द्रव्य देवतादिका प्रकाशन (स्मरण) ही मन्त्र का प्रयोजन है। यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि शास्त्रकारों के अनुसार 'प्रयोगसमवेतार्थस्मारकत्व' मन्त्रों का दृष्ट प्रयोजन है, अत: यज्ञकाल में मन्त्रों का उच्चारण अदृष्ट प्रयोजक है- यह कल्पना नहीं करनी चाहिये; क्योंकि दृष्ट फल की सम्भावना के विद्यमान रहने पर अदृष्ट फल की कल्पना अनुचित होती है।[14] यहाँ यह प्रश्न उठता है कि मन्त्रों का जो अर्थ-स्मरण-रूप दृष्ट प्रयोजन बतलाया गया है, वह प्रकारान्तर से अर्थात् ब्राह्मण-वाक्यों से भी प्राप्त हो जाता है; फिर तो मन्त्रोच्चारण व्यर्थ हुआ? इस आक्षेप का समाधान शास्त्रकारों ने नियम- विधि के आश्रयण से किया है। उनका पक्ष है कि 'स्मृत्वा कर्माणि कुर्वीत' इस विधायक वाक्य से तत्तत्कर्मों के अनुष्ठानकाल में विहित स्मरण के लिये उपायान्तर के अवलम्बन से तत्तत्प्रकरणपठित मन्त्रों का वैयर्थ्य आपतित होता, अत: 'मन्त्रैरेव स्मृत्वा कर्माणि कुर्वीत' (मन्त्रों से ही स्मरण करके कर्म करना चाहिये,)- यह नियम विधि द्वारा स्वीकृत किया जाता है।इसी प्रसंग को आचार्य यास्क ने अपने निरूक्त ग्रन्थ में उठाकर उसके समाधान में एक व्यावहारिक युक्ति प्रस्तुत की है। उनका तर्क है कि मनुष्यों की विद्या (ज्ञान) अनित्य है, अत: अविगुण कर्म के द्वारा फलसम्प्राप्ति –हेतु वेदों में मन्त्र- व्यवस्था है।[15] तात्पर्य यह है कि इस सृष्टि में प्रत्येक मनुष्य बुद्धि ज्ञान, शब्दोच्चारण एवं स्वभावादि में एक-दूसरे से नितान्त भिन्न एवं न्यूनाधिक है। ऐसी स्थिति में यह सर्वथा सम्भव है कि सभी मनुष्य विशुद्धतया एक-जैसा कर्मानुष्ठान नहीं कर सकते। यदि कर्मानुष्ठान एक-रूप में नहीं किया गया तो वह फलदायक नहीं होगा- इस दुरवस्था को मिटाने के लिये वैदिक मन्त्रों के द्वारा कर्मानुष्ठान का विधान किया गया। चूँकि वेदों में नियतानुपूर्वी हैं एवं स्वर वर्णादि की निश्चित उच्चारण-विधि है, अत: बुद्धि, ज्ञान एवं स्वभाव में भिन्न रहने पर भी प्रत्येक मनुष्य उसे एकरूपतया गुरुमुखोच्चारणानुच्चारण विधि से अधिगत कर उसी तरह कर्म में प्रयोग करेगा, जिसके फलस्वरूप सभी को निश्चित फल की प्राप्ति होगी। इस प्रकार मन्त्रों के द्वारा ही कर्मानुष्ठान किया जाना सर्वथा तर्कसंगत एवं साम्यवादी व्यवस्था है। याज्ञिक दृष्टि से मन्त्र चार प्रकार के होते हैं-
  1. करण मन्त्र,
  2. क्रियमाणानुवादि मन्त्र,
  3. अनुमन्त्रण मन्त्र और
  4. जपमन्त्र।

इनमें जिस मन्त्र के उच्चारणानन्तर ही कर्म किया जाता है, वह करण मन्त्र' है। यथा-याज्या पुरोऽनुवाक् आदि। कर्मानुष्ठान के साथ-साथ जो मन्त्र पढ़ा जाता है, वह 'क्रियमाणानुवादि मन्त्र' होता है। यथा-युवा सुवासा0 आदि। जब यज्ञ में यूप-संस्कार किया जाता है तभी यह मन्त्र पढ़ा जाता है। कर्म के ठीक बाद जो मन्त्र पढ़ा जाता है, वह 'अनुमन्त्रण मन्त्र' कहलाता है। यथा- एको मम एका तस्य योऽस्मान् द्वेष्टि0 आदि। यह मन्त्र द्रव्यत्याग रूप याग किये जाने के ठीक बाद यजमान द्वारा पढ़ा जाता है। इनके अतिरिक्त जो 'मयीदमिति यजमानो जपति'[16] इत्यादि वाक्यों द्वारा विहित सन्निपत्योपकारक[17]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै (श्वेताश्वतरोपनिषद 6।18)।
  2. वेद्यन्ते ज्ञाप्यन्ते धर्मादिपुरुषार्थचतुष्टयोपाया येन स वेद: (का0 श्रौ0 भू0, पृ0 4)।
  3. इष्टप्राप्त्यनिष्टपरिहारयोरलौकिकमुपायं यो ग्रन्थो वेदयति स वेद: (का0 भा0 भू0)।
  4. अपौरुषेयं वाक्यं वेद: (अर्थसंग्रह, पृ0 36)।
  5. अनुपलभ्यमानमूलान्तरत्वे सति महाजनपरिगृहीतवाक्यत्वं वेदत्वम्।
  6. मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्।
  7. वेदार्थपारिजात, पृ0 20।
  8. आम्राय: पुनर्मन्त्राश्च ब्राह्मणानि (कौ0 सू0 1।3)।
  9. अपि च यज्ञकर्मणि संहितयैव विनियुज्यन्ते मन्त्रा: (नि0 1।17 पर दुर्ग)।
  10. मन्त्रा मननात्।
  11. मननान्मनुशार्दूल त्राणं कुर्वन्ति वै यत:। ददते पदमात्मीयं तस्मान्मन्त्रा: प्रकीर्तिता:॥ (ई. स0, 3।7।9)।
  12. याज्ञिकानां समाख्यानं लक्षणं दोषवर्जितम्। तेऽनुष्ठानस्मारकादौ मन्त्रशब्दं प्रयुज्यते॥ (जै0न्या0मा0, 2।1।7)।
  13. प्रयोगसमवेतार्थस्मारका मन्त्रा: (अ0 स0, पृ0 157)।
  14. न तु तदुच्चारणमदृष्टार्थत्वम्, सम्भवति दृष्टफलकत्वेऽदृष्टकल्पनाया अन्यारूयत्वात् (अं0 सं0, मन्त्र-विचार-प्रकरण)।
  15. पुरुषविद्याऽनित्यत्वात् कर्मसम्पत्तिर्मन्त्रो वेदे (नि0 1।2।7
  16. का0 श्रौ0, 3। 4।12
  17. मीमांसादर्शन के अनुसार अंग दो प्रकार के होते हैं-1-सिद्धरूप और 2-क्रियारूप। इनमें जाति, द्रव्य एवं संख्या आदि 'सिद्धरूप' हैं, क्योंकि इन सबका प्रयोजन प्रत्यक्ष (दिखायी देनेवाला) है। क्रियारूप अंग के दो भेद हैं- (1) गुणकर्म और (2) प्रधान कर्म। इनमें गुणकर्म को' सन्निपत्योपकारक' कहते हैं। 'सन्निपत्य द्रव्यादिषु सम्बध्य उपकुर्वन्ति तानि' अर्थात जो साक्षात न होकर किसी के माध्यम से मुख्य भाग के उपकारक होते हैं। यथा- 'व्रीह्यवघात एवं सेचनादि।' जो साक्षात रूप में प्रधान क्रिया के उपकारक होते हैं, उन्हें 'प्रधानकर्म' या 'आरादुपकारक' कहते हैं। होते हैं, वे 'जपमन्त्र' हैं। इनमें प्रथम त्रिविध मन्त्रों का अनुष्ठेयस्मारकत्व-रूप दृष्अ प्रयोजन है। जपमन्त्रों का अदृष्ट मात्र प्रयोजन है, ऐसा याज्ञिकों एवं मीमांसकों का सिद्धान्त है।
  18. बृहद्देवता- (1 ।34)।
  19. आप0 श्रौ0 सू0, (24 । 1 ।34)।
  20. 'शेषे ब्राह्मणशब्द:'। (मी0 2।1।33)।
  21. 'ब्राह्मणनाम कर्मणस्तन्मन्त्राणाञ्च व्याख्याग्रन्थ:' (तै0 सं0 1।5।1 पर भाष्य)।
  22. 'वेदचतुष्टयमन्त्राणां कर्मसु विनियोजक: कर्मविधायको नानाविधानादीतिहासाख्यानबहुलो ज्ञानविज्ञानपूर्णो भागो ब्राह्मणभाग:। (श0ब्रा0भू0, पृ0 2
  23. कर्मचोदना ब्राह्मणानि। ब्राह्मणशेषोऽर्थवाद: (आप0 परि0 34।35) 'चोदनेति क्रियाया: प्रवर्तकवचनमाहु:' (भाष्य)।
  24. तत्राज्ञातार्थज्ञापको वेदभागो विधि: (अ0 सं0, पृ0 36
  25. ऋ0 भा0 भू0 विधिप्रामाण्य-विचार।
  26. ब्राह्मणशेषोऽर्थवाद:।
  27. प्राशस्त्यनिन्दान्यतरपरं वाक्यमर्थवाद: (अ0 सं0)।
  28. आम्नायस्य क्रियार्थत्वात्0 (जै0 सू0)।
  29. जै0 सू0 (1।2।7
  30. स द्विविध:- विधिशेषो निषेधशेषश्चेति।
  31. विधिर्विधेयस्तर्कश्च वेद: (पा0 गृ0 सू0 2।6।6)।
  32. तर्कशब्देनार्थवादोऽभिधीयते। तर्क्यते ह्यनेन संदिग्धोऽर्थ: (पा0 गृ0 सू0 2।6।5 पर कर्क)।
  33. स च विधिमन्त्रनामधेयनिषेधार्थवादभेदात् पञ्चविध:।
  34. नामधेयानां च विधेयार्थपरिच्छेदकतयार्थवत्त्वम् (अ0 स0)।
  35. पुरुषस्य निवर्तकं वाक्यं निषेध: (अ0 स0)।
  36. पा0 सू0 (4।2।66)।
  37. भूंत भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदात् प्रसिध्यति॥ (मनु0 12।97)।
  38. वेदार्थपारिजात।
  39. श0 ब्रा0 10।3।6।2
  40. श0 ब्रा0 4।6।7।1
  41. पादेनार्थेन चोपेता वृत्तबद्धा मन्त्रा ऋच:। गीतिरूपा मन्त्रा: सामानि। वृत्तगीतिवर्जितत्वेन प्रश्लिष्टपठिता मन्त्रा: यजूंषि।

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