धर्मसूत्र  

धर्मसूत्रों का उद्भव एवं विकास

धर्मसूत्रों में वर्णाश्रम-धर्म, व्यक्तिगत आचरण, राजा एवं प्रजा के कर्त्तव्य आदि का विधान है। ये गृह्यसूत्रों की शृंखला के रूप में ही उपलब्ध होते हैं। श्रौतसूत्रों के समान ही, माना जाता है कि प्रत्येक शाखा के धर्मसूत्र भी पृथक्-पृथक् थे। वर्तमान समय में सभी शाखाओं के धर्मसूत्र उपलब्ध नहीं होते। इस अनुपलब्धि का एक कारण यह है कि सम्पूर्ण प्राचीन वाङ्मय आज हमारे समक्ष विद्यमान नहीं है। उसका एक बड़ा भाग कालकवलित हो गया। इसका दूसरा कारण यह माना जाता है कि सभी शाखाओं के पृथक्-पृथक् धर्मसूत्रों का संभवत: प्रणयन ही नहीं किया गया, क्योंकि इन शाखाओं के द्वारा किसी अन्य शाखा के धर्मसूत्रों को ही अपना लिया गया था। पूर्वमीमांसा में कुमारिल भट्ट ने भी ऐसा ही संकेत दिया है।[1] आर्यों के रीति-रिवाज वेदादि प्राचीन शास्त्रों पर आधृत थे किन्तु सूत्रकाल तक आते-आते इन रीति-रिवाजों, सामाजिक संस्थानों तथा राजनीतिक परिस्थितियों में पर्याप्त परिवर्तन एवं प्रगति हो गयी थी अत: इन सबको नियमबद्ध करने की आवश्यकता अनुभव की गयी। सामाजिक विकास के साथ ही उठी समस्याएँ भी प्रतिदिन जटिल होती जा रही थीं। इनके समाधान का कार्यभार अनेक वैदिक शाखाओं ने संभाल लिया,जिसके परिणामस्वरूप गहन विचार-विमर्श पूर्वक सूत्रग्रन्थों का सम्पादन किया गया। इन सूत्रग्रन्थों ने इस दीर्घकालीन बौद्धिक सम्पदा को सूत्रों के माध्यम से सुरक्षित रखा, इसका प्रमाण इन सूत्रग्रन्थों में उद्धृत अनेक प्राचीन आचार्यों के मत-मतान्तरों के रूप में मिलता है। यह तो विकास का एक क्रम था जो तत्कालिक परिस्थिति के कारण निरन्तर हो रहा था। यह विकासक्रम यहीं पर नहीं रुका अपितु सूत्रग्रन्थों में भी समयानुकूल परिवर्तन एवं परिवर्धन किया गया जिसके फलस्वरूप ही परवर्ती स्मृतियों का जन्म हुआ। नयी-नयी समस्याएँ फिर भी उभरती रहीं। उनके समाधानार्थ स्मृतियों पर भी भाष्य एवं टीकाएँ लिखी गयीं जिनके माध्यम से प्राचीन वचनों की नवीन व्याख्याएँ की गयीं। इस प्रकार अपने से पूर्ववर्ती आधार को त्यागे बिना ही नूतन सिद्धान्तों तथा नियमों के समयानुकूल प्रतिपादन का मार्ग प्रशस्त कर लिया गया।

धर्म का स्वरूप

जैसा कि नाम से ही विदित है कि धर्मसूत्रों में व्यक्ति के धर्मसम्बन्धी क्रियाकलापों पर विचार किया गया है, किन्तु धर्मसूत्रों में प्रतिपादित धर्म किसी विशेष पूजा-पद्धति पर आश्रित न होकर समस्त आचरण व व्यवहार पर विचार करते हुए सम्पूर्ण मानवजीवन का ही नियन्त्रक है। ‘धर्म’ शब्द का प्रयोग वैदिक संहिताओं तथा उनके परवर्ती साहित्य में प्रचुर मात्रा में होता जा रहा है। यहाँ पर यह अवधेय है कि परवर्ती साहित्य में धर्म शब्द का वह अर्थ दृष्टिगोचर नहीं होता, जो कि वैदिक संहिताओं में उपलब्ध है। संहिताओं में धर्म शब्द विस्तृत अर्थ में प्रयुक्त है। अथर्ववेद में पृथिवी के ग्यारह धारक तत्त्वों की गणना ‘पृथिवीं स्धारयन्ति’ कहकर की गयी है।[2] इसी प्रकार ॠग्वेद[3] में ‘तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्’ कहकर यही भाव प्रकट किया गया है। इस प्रकार यह धर्म किसी देशविशेष तथा कालविशेष से सम्बन्धित न होकर ऐसे तत्वों को परिगणित करता है जो समस्त पृथिवी अथवा उसके निवासियों को धारण करते हैं। वे नियम शाश्वत हैं तथा सभी के लिए अपरिहार्य हैं। मैक्समूलर ने भी धर्म के इस स्वरूप की ओर इन शब्दों में इंगित किया है- प्राचीन भारतवासियों के लिए धर्म सबसे पहले अनेक विषयों के बीच एक रुचि का विषय नहीं था अपितु वह सबका आत्मसमर्पण कराने वाली विधि थी। इसके अन्तर्गत न केवल पूजा और प्रार्थना आती थी अपितु वह सब भी आता था जिसे हम दर्शन, नैतिकता, क़ानून और शासन कहते हैं। उनका सम्पूर्ण जीवन उनके लिए धर्म था तथा दूसरी चीज़ें मानों इस जीवन की भौतिक आवश्यकताओं के लिए निमित्त मात्र थीं।‘[4] संहिताओं के परवर्ती साहित्य में धर्म केवल वर्णाश्रम के आचार-विचार तथा क्रियाकलापों तक ही सीमित रह गया। उपनिषित-काल में धर्म का यही स्वरूप उपलब्ध होता है। छान्दोग्य उपनिषद[5] में धर्म के तीन स्कन्ध गिनाए गये हैं। इनमें यज्ञ, अध्ययन तथा दान प्रथम, तप द्वितीय तथा आचार्यकुल में वास तृतीय स्कन्ध है।[6] स्पष्ट ही इनके अन्तर्गत वर्गों में रूढ़ होकर परवर्ती काल में पूजापद्धति को भी धर्म ने अपने में समाविष्ट कर लिया।

इतना होने पर भी सभी ने धर्म का मूल वेद को माना जाता है। मनु ने तो इस विषय में 'धर्म जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुति:' तथा 'वेदोऽखिलो धर्ममूलम्' आदि घोषणा करके वेदों को ही धर्म का मूल कहा है।[7] गौतम धर्मसूत्र में तो प्रारम्भ में ही 'वेदों धर्ममूलम'।[8] ‘तद्विदां च स्मृतिशीले’[9] सूत्रों द्वारा यही बात कही गयी है। ये दोनों सूत्र मनुस्मृति के 'वेदोंऽखिलो धर्ममूलम स्मृतिशीले च तद्विदाम्' श्लोकांश के ही रूपान्तर मात्र हैं। इसी प्रकार वासिष्ठ धर्मसूत्र[10] में भी 'श्रुतिस्मृतिविहितो धर्म:' कहकर धर्म के विषय में श्रुति तथा स्मृति को प्रमाण माना है। बौधायन धर्मसूत्र में श्रुति तथा स्मृति के अतिरिक्त शिष्टाचरण को भी धर्म का लक्षण कहकर मनुस्मृति में प्रतिपादित श्रुति, स्मृति तथा शिष्टाचरण को ही सूत्र रूप में निबद्ध किया है।[11] इस प्रकार धर्म के लक्षण में श्रुति के साथ स्मृति तथा शिष्टाचरण को भी सम्मिलित कर लिया गया। दर्शनशास्त्र में धर्म का लक्ष्य लोक-परलोक की सिद्धि[12] कहकर अत्यन्त व्यापक कर दिया गया तथा एक प्रकार से समस्त मानव-जीवन को ही इसके द्वारा नियन्त्रित कर दिया गया। वैशेषिक दर्शन के उक्त लक्षण का यही अर्थ है कि समस्त जीवन का, जीवन के प्रत्येक श्वास एवं क्षण का उपयोग ही इस रीति से किया जाए कि जिससे अभ्युदय तथा नि:श्रेयस की सिद्धि हो सके। इसमें ही अपना तथा दूसरों का कल्याण निहित है। धर्म मानव की शक्तियों एवं लक्ष्य को संकुचित नहीं करता अपितु वह तो मनुष्य में अपरिमित शक्ति देखता है जिसके आधार पर मनुष्य अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। अभ्युदय तथा नि:श्रेयस की सिद्धि नामक लक्ष्य इतना महान् है कि इससे बाहर कुछ भी नहीं है। इसे प्राप्त करने की नि:सीम सम्भावनाएँ मनुष्य में निहित हैं। इस प्रकार जीवन के प्रत्येक पक्ष पर धर्म विचार करता है तथा अपनी व्यवस्था देता है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. कुमारिलभट्ट 8, पूर्वमीमांसासूत्र 1.3.11 स्वशाखाविहितैश्चापि शाखान्तरगतान् विधीन्। कल्पकारा निबध्नन्ति सर्वानेवं विकल्पितान्॥ स्वशाखोपसंहारो जैमिनेश्चापि सम्मत:॥
  2. सत्यं बृहद्ॠतमुग्रं दीक्षातपोब्रह्मयज्ञ: पृथिवीं धारयन्ति-अथर्ववेद, पृथिवीसूक्त, 1।
  3. ॠग्वेद, 10, 90, 16
  4. मैक्समूलर, इण्डिया व्हॉट कैन इट टीच अस, हिन्दी अनुवाद, दिल्ली पृष्ठ 107।
  5. छान्दोग्य उपनिषद 2.23
  6. छान्दोग्य उपनिषद, 2.23
  7. मनुस्मृति अ., 2
  8. गौतम धर्मसूत्र, 1.1.1
  9. गौतम धर्मसूत्र, 1.1.2
  10. वासिष्ठ धर्मसूत्र, 1.4.6
  11. उपदिष्टो धर्म: प्रतिवेदम् स्मार्तों द्वितीय: तृतीय: शिष्टागम: बौधायन धर्म सूत्र, 1.1 सूत्र 1-3
  12. यतोऽभ्युदयनि: श्रेयससिद्धि: स धर्म:- वैशेषिक सूत्र 1.1.2
  13. मनसा वा तत्समग्रमाचारमनुपालयेदापत्कल्प:। बौधायन धर्मसूत्र 1-9-67
  14. गौतम धर्मसूत्र 1.4.18-19
  15. आचार: परमो धर्म: सर्वेषामिति निश्चय:- वसिष्ठ धर्मसूत्र 6.1
  16. आचारहीनं न पुनन्ति वेदा:- मनुस्मृति।
  17. वसिष्ठ धर्मसूत्र 6, 4
  18. बौधायन धर्मसूत्र 1.2-1
  19. मनुस्मृति 1.2-11
  20. बौधायनधर्म सूत्र प्रश्न प्रश्नकर्ता अध्याय 8-9
  21. गौतम धर्मसूत्र 2.2.19 में
  22. गौतमधर्म सूत्र 3.3.7 त्रीणि प्रथमान्यनिर्देश्यान्मनु:।
  23. गौतमधर्मसूत्र, 1.2.15.1.2.56.1.3.1, 1.3.1, 2.9.7, 1.4.17, 3.3-14 आदि
  24. गौतमधर्मसूत्र, 1.3-35, 1.4.18
  25. बौधायनधर्म सूत्र, संपादन उमेशचन्द्र पाण्डेय, चौखम्भा सं. सीरीज 1972, प्रस्तावना, पृष्ठ 10।
  26. कुन्दनलाल शर्मा, वै. वाङ्. का बृहद इति. (कल्पसूत्र) 1989, पृष्ठ 472
  27. मैक्स. दि. ऐ. सं. लिड़रेचर पृष्ठ 70 (वै. वा. का बृहद इति.) पृष्ठ 472।
  28. धर्मशास्त्र का इतिहास, प्रथम खण्ड म.म. काणे (हिन्दी अनुवाद) पृष्ठ 8
  29. अविशेषेण पुत्राणां दायो भवति धर्मत:। मिथुनानां विसर्गादौ मनु: स्वायम्भुवोऽब्रवीत्-निरुक्त 3.4-5
  30. गौतमधर्मसूत्र, वाराणसी 1966, भूमिका, पृष्ठ 7
  31. हि.ऐ.सं.लिट्., इलाहाबाद संस्करण, पृ. 32।
  32. रामगोपाल, इण्डिया आप वैदिक कल्पसूत्राज पृ0 7।
  33. वै.वा.का बृहद् इति. पृ. 492।
  34. गौतमधर्मसूत्र – भूमिका, पृष्ठ 6

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