योग दर्शन  

'योग' आर्य जाति की प्राचीनतम विद्या है, जिसमें विवाद को प्रश्रय नहीं मिला है। योग ही सर्वोत्तम मोक्षोपाय है। भव ताप सन्तप्त जीव को ईश्वर से मिलाने में योग ही भक्ति और ज्ञान का प्रधान साधन है। चित्तवृत्तियों का निरोध ही योग है- 'योगश्चित्तवृत्ति-निरोध:।' यद्यपि उपलब्ध योगसूत्रों के रचयिता महर्षि पतञ्जलि माने जाते हैं, किन्तु योग पतञ्जलि से भी प्राचीन अध्यात्म-प्रक्रिया है। संहिताओं, ब्राह्मणों तथा उपनिषदों में अनेकत्र इसका संकेत एवं विवेचन उपलब्ध है। योग सांख्य-अभिमत तत्त्व को स्वीकारता है, परन्तु ईश्वर की सत्ता मानकर उसे छब्वीसवाँ तत्त्व मानता है। इसीलिए योग को सेश्वर सांख्य भी कहा जाता है। योग दर्शन सूत्र रूप है। इन सूत्रों के रचयिता महर्षि पतञ्जलि हैं। इन्होंने 195 सूत्रों में सम्पूर्ण योग दर्शन को विभाजित किया है।

‘योग’ अत्यन्त व्यापक विषय है। वेद, उपनिषद, भागवत आदि पुराण, रामायण, महाभारत, आयुर्वेद, अलंकार आदि ऐसा कोई भी शास्त्र नहीं है, जिसमें 'योग' का उल्लेख न मिलता हो। पतंजलि कृत दर्शन में योग की व्यापक चर्चा होने के कारण उनका शास्त्र 'योग दर्शन' के नाम से विभूषित हुआ। योग की अनेक शाखा-प्रशाखाएँ हैं। विश्लेषण के आधार भिन्न-भिन्न होने से वह अनेकविध नामों से पुकारा जाने लगा। 'योगसिद्धान्तचन्द्रिका' के रचयिता नारायणतीर्थ ने ‘योग’ को क्रिया योग, चर्या योग, कर्म योग, हठ योग, मन्त्र योग, ज्ञान योग, अद्वैत योग, लक्ष्य योग, ब्रह्म योग, शिव योग, सिद्धि योग, वासना योग, लय योग, ध्यान योग तथा प्रेमभक्ति योग द्वारा साध्य माना है एवं अनेक योगों से ध्रुवीकृत योग अर्थात समाधि को राजयोग नाम से अभिहित किया है।[1]

  • योग-साहित्य को दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-
  1. पातंजलि योग-साहित्य तथा
  2. पातंजलितर योग-साहित्य

सांख्य- योग के समान तन्त्र होने की पुष्टि

भारतीय दर्शन में न्याय वैशेषिक की भाँति सांख्य-योग को समान तन्त्र कहते हैं। शास्त्रीय सिद्धान्तों में विभिन्नता की अपेक्षा समानता अधिक होने के कारण दो शास्त्रों को ‘समानतन्त्र’ की संज्ञा प्रदान की जाती है। यही कारण है कि व्यासभाष्य के प्रत्येक पाद की समाप्ति पर व्यासदेव ने योग को ‘सांख्यप्रवचन योगशास्त्र’ कहा है।[2] आचार्य विज्ञानभिक्षु ने योगवार्त्तिक में सांख्य-योग के ‘समानतन्त्र’ होने की स्थान-स्थान पर पुष्टि की है। इसके कुछ प्रमुख प्रकरण अधोलिखित हैं –

सांख्य तथा योग दोनों दर्शनों में बुद्धि और पुरुष में अनादि स्वस्वामिभावसम्बन्ध को स्थापित किया गया है। पुरुषार्थवती बुद्धि प्रतिबिम्बविधया पुरुष का विषय बनती है। विषयप्रयोग और विवेकख्याति ये दो पुरुषार्थ बुद्धि के कहे जाते हैं। पुरुषार्थशून्य बुद्धि में पुरुष का विषय बनने की क्षमता नहीं है। योग के इस सिद्धान्त को विज्ञानभिक्षु समानतन्त्र सांख्य से परिपुष्ट करते हैं-

'अत एव पुरुषार्थवत्येव बुद्धि: पुरुषस्य विषय इति सांख्यसिद्धान्त:'[3]

योग का अर्थ

'योग' शब्द समाध्यर्थक युज् धातु से निष्पन्न होता है, जिसका अर्थ है समाधि। पतञ्जलि का योगलक्षण है- 'योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:' अर्थात् चित्त की वृत्तियों को रोकना। चित्त से अभिप्राय अन्त:करण अर्थात्‌ मन, बुद्धि, अहंकार है। सत्त्वादिगुणों के तर-तमभाव से 'चित्तवृत्ति' में तारतम्य उत्पन्न होता है। उस कारण वह 'बहिर्मुख' और 'अन्तर्मुख' भी होता रहता है।

चित्त

चित्त सत्त्वप्रधान प्रकृति-परिणाम है। चित्त प्राकृत होने से जड़ और प्रतिक्षण परिणामशाली है। इस चित्त की 5 भूमियाँ या अवस्थायें होती हैं- क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. निदिध्यासनञ्चैकतानतादिरूपो राजयोगापरपर्याय: समाधि:। तत्साधनं तु क्रियायोग:, चर्यायोग:, कर्मयोगो, हठयोगो, मन्त्रयोगो, ज्ञानयोग:, अद्वैतयोगो, लक्ष्ययोगो, ब्रह्मयोग:, शिवयोग:, सिद्धियोगो, वासनायोगो, लययोगो, ध्यानयोग:, प्रेमभक्तियोगश्च - योगसिद्धान्तचन्द्रिका पृ. सं. 2।
  2. इति श्रीपातञ्जले सांख्यप्रवचने योगशास्त्रे श्रीमद्व्यासभाष्ये प्रथम: समाधिपाद:- व्यासभाष्य 1/51 ।
  3. (योगवार्त्तिक 1/4)।
  4. (योगवार्तिक 1/7)
  5. (योगवार्त्तिक 2/19)
  6. (योगवार्त्तिक 3/12)
  7. (योगवार्त्तिक 3/35)
  8. (योगवार्त्तिक 4/12)
  9. (योगवार्त्तिक 4/14)
  10. (योगवार्त्तिक 2/5)
  11. प्रकृतेर्महांस्ततोऽहङ्कारस्तस्माद् गणश्च षोडशक:। तस्मादपि षोडशकात् पञ्चभ्य: पञ्च भूतानि ॥ - सांख्यकारिका 22
  12. विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनस: स्थितिनिबन्धनी-योगसूत्र 1/35।
  13. चिन्तान्तरदृशयत्वे बुद्धिबुद्धेरतिप्रसङ्ग: स्मृतिसङ्करश्च- योगसूत्र 4/21।
  14. विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि- योगसूत्र 2/19।
  15. योगश्चित्तवृत्तिनिरोध: - योगसूत्र 1/1।
  16. द्रष्ट्टदृश्योपरकक्तं चित्तं सर्वार्थम् – योगसूत्र 4/23।
  17. निरोध: (धर्म:) त्रिलक्षण: त्रिभिरध्वभिरतीतानागतादिकालभेदैर्युक्त....... अनागतो निरोधरूपो धर्मो वर्तमानभूतोऽतीतो भविष्यतीति त्रिलक्षणवियुक्त: भास्वती 3/9 ।
  18. निरोध:..... लयाख्याऽधिकरणस्यैवावस्थाविशेषोऽभावस्यास्मन्मतेऽधिकरणावस्थाविशेषरूपत्वात्- योगवार्त्तिक 1/1।
  19. निरोध: उपशमो निरिन्धनाग्निवत् स्वकारणे लय: - योगसिद्धान्तचन्द्रिका 1/2
  20. अभीष्टविषये सदैव स्थितिशीला चित्तावस्था एकाग्रभूमि:- भास्वती 1/ 2।
  21. सम्यक्ज्ञाकत्वेन योग: सम्प्रज्ञातनामा भवति – योगवार्त्तिक 1। 2 ।
  22. क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनता समापत्ति: - योगसूत्र 1/43।
  23. वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात् सम्प्रज्ञात:- योगसूत्र 1/17 ।
  24. तत्र पूर्वपूर्वभूमिकात्यागेनोत्तरोत्तरभूम्यारोह एकत्रैवालम्बने कार्य: अन्यथा पूर्वपूर्वोपासनातगदोषापत्ते: नागेशमट्टीय बृहत्योगसूत्रवृत्ति 1/17
  25. तस्यापि निरोधे सर्ववृत्तिनिरोधान्निर्बीज: समाधि: - योगसूत्र 1/51।
  26. स खल्वयं द्विविध उपायप्रत्ययो भवप्रत्ययश्च- व्यासभाष्य 1/19 ।
  27. तयोर्मध्य उपायप्रत्ययो योगिनां मोक्षमाणानां भवति- तत्त्ववैशारदी 1/20
  28. यथा वर्षातिपातिमृद्भावमुपगतो मण्डूकदेह: पुनरम्भोदवारिधारावसेकान्मण्डूकदेहभावमनुभवति- तत्त्ववैशारदी 1/19।
  29. भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम्- योगसूत्र 1/19।
  30. श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम्- योगसूत्र 1/20।
  31. तत्र मन्दमध्यमोत्तमभेदेन त्रिविधा योगाधिकारिणो भवन्त्यारुरुक्षुयुञ्जानयोगारूढरूपा: - योगसारसंग्रह पृ. सं. 37 ।
  32. अभ्यासवैराग्याभ्यां तत्रिरोध:- योगसूत्र 1/12 ।
  33. तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यास: - योगसूत्र 1/13 ।
  34. स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमि:- योगसूत्र 1/14
  35. तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् – योगसूत्र 1/16 ।
  36. तप: स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोग:- योगसूत्र 2/1।
  37. यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टाङ्गानि- योगसूत्र 2/29।
  38. स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात् – योगसूत्र 3/51।
  39. तदा द्रष्टु: स्वरूपेऽवस्थानम्- योगसूत्र 1/3।
  40. पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसव: कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्ति:- योगसूत्र 4/34।
  41. सत्त्वपुरुषयो: शुद्धिसाम्ये कैवल्यम्- योगसूत्र 3/55
  42. हेयं दु:खमनागतम्- योगसूत्र 2/16
  43. द्रष्ट्टश्ययो: संयोगो हेयहेतु: - योगसूत्र 2/17।
  44. विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपाय:- योगसूत्र 2/26 ।
  45. तदभावात्संयोगाभावो हानं तद्दृशे: कैवल्यम् 2/25।
  46. एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याता: - योगसूत्र 3/13।
  47. व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ निरोधक्षणचित्तान्वयो निरोधपरिणाम:- योगसूत्र 3/9।
  48. सर्वार्थतैकाग्रतयो: क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणाम: - योगसूत्र 3/11
  49. तत: पुन: शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रतापरिणाम: - योगसूत्र 3/12।
  50. शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात्संकरस्त प्रविभागसंयमात्सर्वभूतरुतज्ञानम्- योगसूत्र 3/17
  51. क्लेशमूल: कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीय: - योगसूत्र 2/12 ।
  52. सति मूले तद्वियाको जात्यायुर्भौगा: - योगसूत्र 2/13।

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