नवमानववाद  

नवमानववाद एक प्रमुख विचारधारा है, जिसने पश्चिमी जगत् में मध्य काल की समाप्ति करने में विशेष योगदान दिया। मध्य काल में धार्मिक घटाटोप के कारण समस्त मूल्यों और प्रतिमानों का स्रोत किसी-न-किसी दिव्य सत्ता को माना जाता था और मनुष्य को आरम्भ से ही उस दिव्य प्रतिमान से नीचे गिरा हुआ प्राणी समझा जाता था। मानववादियों ने इस मान्यता का तिरस्कार किया।

विचार

मानववादियों ने यह घोषित किया कि सम्पूर्णतम मनुष्य ही मनुष्य का प्रतिमान है। इसके लिए मानववादियों ने एक ओर मानवोपरि दिव्य सत्ता का निषेध किया और दूसरी ओर अमानवीय यांत्रिकता का। मानववादी यह मानते हैं कि मनुष्य में जो पाशविक है और जो दिव्य है, उन दोनों के मध्य में कुछ ऐसा है, जो पूर्णत: मानवीय है और उसी को नैतिकता, कला, सौन्दर्य बोध तथा अन्य आचार-विचार का प्रतिमान मानना चाहिए। कालांतर में मानववाद के अंतर्गत बहुत-से विचार और बहुत प्रकार की प्रवृत्तियाँ समाहित होती गयीं, जिनमें से बहुत-सी तो परस्पर विरोधी भी थीं और कभी-कभी मानवता की ऐसी व्याख्याएँ उपस्थित करती थीं, जो एक-दूसरे से पृथक् थीं।[1]

पिछली अर्ध शताब्दी में कई ऐसी विचारधाराओं का उदय हुआ, जो नवमानववाद को अपना आधारभूत सिद्धांत मानती रही हैं। इन विचारधाराओं में मानवता को एक स्थिर और सदा एक-सा रहने वाला तत्त्व न मानकर चिरंतन विकासशील तत्त्व माना जाता है और उसी सिद्धांत के अनुसार वर्तमान मनुष्य को विकास की एक कड़ी मानकर भावी मनुष्य को इस यात्रा की आगामी कड़ी माना जाता है। उसके विकास में सहायक होने वाले आचार-विचार को ही वर्तमान मनुष्य के लिए आदर्श के रूप में स्वीकार किया जाता है। उदाहरण के लिए, अरविन्द यह मानते हैं कि जैसे निरंतर विकास की शृंखला हमें पशुता से मनुष्यता की स्थिति में लाई है, वैसे ही वह हमें इसके आगे भी ले जायगी और आगामी मनुष्य में वे कतिपय आंतरिक शक्तियों का विकास अनुमानित करते हैं।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 हिन्दी साहित्य कोश, भाग 1 |प्रकाशक: ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी |संकलन: भारतकोश पुस्तकालय |संपादन: डॉ. धीरेंद्र वर्मा |पृष्ठ संख्या: 314 |
  2. डॉ. धर्मवीर भारती, सम्पादक 'धर्मयुग', बम्बई
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