बोधिसत्व  

महात्मा बुद्ध 'शाक्य' गोत्र के थे और उनका वास्तविक नाम 'सिद्धार्थ' था । उनका जन्म लुंबिनी, कपिलवस्तु (शाक्य महाजनपद की राजधानी) में हुआ था । लुंबिनी में, जो दक्षिण मध्य नेपाल में है, महाराज अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व एक स्तम्भ निर्मित करवाया था। यह स्तम्भ 'बुद्ध' के गुणगान के विषय में है।

परिचय

इन्हें भी देखें: बुद्ध

सिद्धार्थ के पिता शुद्धोदन शाक्यों के राजा थे। मान्यता के अनुसार सिद्धार्थ की माँ उनके जन्म के कुछ देर बाद ही मर गयी थी । कहा जाता है कि एक ऋषि ने सिद्धार्थ से मिलकर भविष्यवाणी कि वह या तो एक महान् राजा बनेंगे, या एक महान् संत । यह सुनकर राजा शुद्धोदान ने सिद्धार्थ को दुःखों से दूर रखने का प्रत्येक सम्भव प्रयास किया । किंतु 29 वर्ष की आयु में उनकी दृष्टि चार दृश्यों पर पड़ी (संस्कृत चतुर निमित्त) -

  1. एक बूढ़े अपाहिज आदमी,
  2. एक बीमार आदमी,
  3. एक मुरझाती हुई लाश,
  4. एक साधु ।

यह देखकर सिद्धार्थ समझ गये कि सबका जन्म होता है, सब बूढ़े होते हैं, बीमार होते हैं और अंत में एक दिन सबकी मृत्यु होती है । उन्होंनें अपना सब कुछ छोड़कर साधु जीवन अपना लिया ताकि वे इसका कोई उत्तर खोज पाएं ।

सिद्धार्थ ने पांच ब्राह्मणों के साथ अपने प्रश्नों के उत्तर ढूंढने प्रारम्भ किये किंतु उन्हें उत्तर नहीं मिले । फिर उन्होंने तपस्या की ।तपस्या करते करते छः वर्ष बाद उन्हें सफलता नहीं मिली। उन्होंने 'अष्टांग मार्ग' ढूंढ निकाला, जो मध्यम मार्ग भी कहा जाता है क्योंकि यह मार्ग तपस्या और असंयम की पराकाष्ठाओं के मध्य में है । अपने शरीर में शक्ति के लिये, उन्होंने बकरी का दूध ले वे एक पीपल के पेड़ (जो अब 'बोधि वृक्ष' कहलाता है) के नीचे बैठ कर प्रतिज्ञा की कि वे सत्य जाने बिना नहीं उठेंगे । 35 वर्ष की आयु पर, उन्होंने 'बोधि' पाई और वे बुद्ध बन गये । उनका पहला धर्मोपदेश वाराणसी के पास सारनाथ में था।

बुद्ध भाव

इन्हें भी देखें: महायान साहित्य एवं बुद्ध की शिक्षा 'बुद्ध' वह कहे जाते हैं,जिन्होंने सालों के ध्यान के बाद यथार्थता का 'सत्य भाव' पहचान लिया हो । इस पहचान को 'बोधि' नाम दिया गया है । जो 'अज्ञानता की नींद' से जागते हैं, वह ही 'बुद्ध' कहे जाते हैं । मान्यता है कि बुद्ध शाक्यमुनि केवल एक बुद्ध हैं । बौद्ध धर्म का अन्तिम लक्ष्य है 'दुःख भरी स्थिति का अंत' । बुद्ध ने कहा - 'मैं केवल एक ही पदार्थ सिखाता हूँ - दुःख और दुःख निरोध' - बुद्ध । बौद्ध धर्म के अनुयायी अष्टांग मार्ग के अनुसार जीवन जीकर दुःख से मुक्ति और निर्वाण पाने का प्रयत्न करते हैं ।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

संबंधित लेख

और पढ़ें
"http://m.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=बोधिसत्व&oldid=612120" से लिया गया