संत ज्ञानेश्वर  

संत ज्ञानेश्वर
संत ज्ञानेश्वर
पूरा नाम संत ज्ञानेश्वर
जन्म 1275 ई.
जन्म भूमि महाराष्ट्र
मृत्यु 1296 ई.
अभिभावक विट्ठल पंत
गुरु निवृत्तिनाथ
कर्म भूमि महाराष्ट्र
कर्म-क्षेत्र दार्शनिक
मुख्य रचनाएँ ज्ञानेश्वरी, अमृतानुभव
भाषा मराठी
अन्य जानकारी ज्ञानेश्वर ने भगवदगीता के ऊपर मराठी भाषा में एक 'ज्ञानेश्वरी' नामक 10,000 पद्यों का ग्रंथ लिखा है।

संत ज्ञानेश्वर की गणना भारत के महान् संतों एवं मराठी कवियों में होती है। इनका जन्म 1275 ई. में महाराष्ट्र के अहमदनगर ज़िले में पैठण के पास आपेगाँव में भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को हुआ था। इनके पिता का नाम विट्ठल पंत तथा माता का नाम रुक्मिणी बाई था। विवाह के कई वर्षों बाद भी कोई सन्तान न होने पर विट्ठल पंत ने सन्न्यास ग्रहण कर लिया और स्वामी रामानंद को अपना गुरु बना लिया। बाद में गुरु के आदेश पर ही इन्होंने फिर से गृहस्थ जीवन को अपनाया। इनके इस कार्य को समाज ने मान्यता प्रदान नहीं की और समाज से इनका बहिष्कार कर दिया और इनका बड़ा अपमान किया। ज्ञानेश्वर के माता-पिता इस अपमान के बोझ को सह न सके और उन्होंने त्रिवेणी में डूबकर प्राण त्याग कर दिए। संत ज्ञानेश्वर ने भी 21 वर्ष की आयु में ही संसार का त्यागकर समाधि ग्रहण कर ली।

पारिवारिक पृष्ठभूमि

संत ज्ञानेश्वर के पूर्वज पैठण के पास गोदावरी तट के निवासी थे और बाद में 'आलंदी' नामक गाँव में बस गए थे। ज्ञानेश्वर के पितामह 'त्र्यंबक पंत' गोरखनाथ के शिष्य और परम भक्त थे। ज्ञानेश्वर के पिता विट्ठल पंत इन्हीं त्र्यंबक पंत के पुत्र थे। विट्ठल पंत बड़े विद्वान और भक्त थे। उन्होंने देशाटन करके शास्त्रों का अध्ययन किया था। उनके विवाह के कई वर्ष हो गए थे पर कोई संतान नहीं हुई। इस पर उन्होंने सन्न्यास लेने का निश्चय किया, पर स्त्री इसके पक्ष में नहीं थी। इसलिए वे चुपचाप घर से निकलकर काशी में स्वामी रामानंद के पास पहुँचे और यह कहकर कि संसार में मैं अकेला हूं, उनसे सन्न्यास की दीक्षा ले ली।

जन्म

कुछ समय बाद स्वामी रामानंद दक्षिण भारत की यात्रा करते हुए आलंदी गाँव पहुँचे। वहाँ जब विट्ठल पंत की पत्नी ने उन्हें प्रणाम किया, तो स्वामी जी ने उसे पुत्रवती होने का आशीर्वाद दे दिया। इस पर विट्ठल पंत की पत्नी रूक्मिणी बाई ने कहा- मुझे आप पुत्रवती होने का आशीर्वाद दे रहे हैं, पर मेरे पति को तो आपने पहले ही संन्यासी बना लिया है। इस घटना के बाद स्वामी जी ने काशी आकर विट्ठल पंत को फिर गृहस्य जीवन अपनाने की आज्ञा दी। उसके बाद ही उनके तीन पुत्र और कन्या पैदा हुई। ज्ञानेश्वर इन्हीं में से एक थे। संत ज्ञानेश्वर के दोंनों भाई 'निवृत्तिनाथ' एवं 'सोपानदेव' भी संत स्वभाव के थे। इनकी बहिन का नाम 'मुक्ताबाई' था।

माता-पिता की मृत्यु

सन्न्यास छोड़कर गृहस्थ बनने के कारण समाज ने ज्ञानेश्वर के पिता विट्ठल पंत का बहिष्कार कर दिया। वे कोई भी प्रायश्चित करने के लिए तैयार थे, पर शास्त्रकारों ने बताया कि उनके लिए देह त्यागने के अतिरिक्त कोई और प्रायश्चित नहीं है और उनके पुत्र भी जनेऊ धारण नहीं कर सकते। इस पर विट्ठल पंत ने प्रयाग में त्रिवेणी में जाकर अपनी पत्नी के साथ संगम में डूबकर प्राण दे दिए। बच्चे अनाथ हो गए। लोगों ने उन्हें गाँव के अपने घर में भी नहीं रहने दिया। अब उनके सामने भीख माँगकर पेट पालने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं रह गया।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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