मधुसूदन सरस्वती  

मधुसूदन सरस्वती अद्वैत सम्प्रदाय के प्रधान आचार्य और ग्रन्थ लेखक थे। इनके गुरु का नाम विश्वेश्वर सरस्वती था। मधुसूदन सरस्वती का जन्म स्थान बंगदेश था। ये फ़रीदपुर ज़िले के कोटलिपाड़ा ग्राम के निवासी थे। विद्याध्ययन के अनन्तर ये काशी में आये और यहाँ के प्रमुख पंडितों को शास्त्रार्थ में पराजित किया। इस प्रकार विद्वन्मण्डली में सर्वत्र इनकी कीर्तिकौमुदी फैलने लगी। इसी समय इनका परिचय विश्वेश्वर सरस्वती से हुआ और उन्हीं की प्रेरणा से ये दण्डी संन्यासी हो गए।

मत का खण्डन

मधुसूदन सरस्वती मुग़ल सम्राट शाहजहाँ के समकालीन थे। कहते हैं कि इन्होंने माध्व पंडित रामराज स्वामी के ग्रन्थ न्यायामृत का खण्डन किया था। इससे चिढ़कर उन्होंने अपने शिष्य व्यास रामाचार्य को मधुसूदन सरस्वती के पास वेदान्तशास्त्र का अध्ययन करने के लिए भेजा। व्यास रामाचार्य ने विद्या प्राप्त कर फिर मधुसूदन स्वामी के ही मत का खण्डन करने के लिए तरगिणी नामक ग्रन्थ की रचना की। इससे ब्रह्मानन्द सरस्वती आदि ने असंतुष्ट होकर तरंगिणी का खण्डन करने के लिए 'लघुचन्द्रिका' नामक ग्रन्थ की रचना की।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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