वाचस्पतिमिश्र  

वाचस्पतिमिश्र का नाम भारतीय दर्शनों के छात्रों के लिए सुपरिचित है, क्योंकि भारत के विविध आस्तिक दर्शनों को वाचस्पतिमिश्र का महत्त्वपूर्ण योगदान है। न्याय, मीमांसा, सांख्य-योग तथा अद्वैत वेदांत, इन सब दर्शनों में वाचस्पतिमिश्र ने व्याख्या ग्रन्थ लिखे हैं। इससे उन दर्शनों का विशदीकरण बहुत अच्छी तरह हुआ है। इस कारण दर्शनशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए दर्शनों का रहस्य जान लेने के लिए वाचस्पति के ग्रन्थों का अध्ययन आवश्यक सा हो गया है।

उपाधि

वाचस्पति का योगदान सिर्फ़ प्राचीन दर्शनों के विशदीकरण में नहीं है, बल्कि उन दर्शनों में नए विचार लाते हुए उनका विकास करने का कार्य भी वाचस्पति ने किया है। सभी दर्शनों में स्वतंत्र प्रज्ञा से विहार करने का उनका विलक्षण स्वभाव देखते हुए उन्हें पंडितों ने 'सर्वतंत्र स्वतंत्र' यह सार्थक उपाधि दी है।

परिचय

कई विद्वानों के अनुसार वाचस्पतिमिश्र नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्र के नजदीक रहते थे। वहाँ एक देहात के नजदीक 'भामा' नाम की नदी बहती है, उसका नामकरण वाचस्पति की कन्या 'भामती' के नाम के आधार पर किया गया है। वाचस्पति ने अपने अद्वैत वेदांत पर लिखे व्याख्या ग्रन्थ को अपनी कन्या का ही नाम दिया था।[1] लेकिन दिनेश चंद्र भट्टाचार्य के अनुसार वाचस्पतिमिश्र का निवास स्थान आज जहाँ दरभंगा की पूर्वसीमा है, उस प्रदेश में था। उमेश मिश्र के अनुसार वाचस्पतिमिश्र दरभंगा ज़िले में 'थारही' नामक गांव में रहते थे। अनेक विद्वानों का कहना है कि वाचस्पतिमिश्र 'मैथिल' ब्राह्मण थे। वाचस्पतिमिश्र का काल नवीं सदी का उत्तरार्ध या दसवीं सदी बताया जाता है।

वाचस्पति ने अपने गुरु का निर्देश करते समय उन्हें 'न्याय मंजरी' का कर्ता बताया है। अब ज़्यादातर पंडितों का मत यह है कि वाचस्पतिमिश्र का गुरु त्रिलोचन नाम का था तथा त्रिलोचन के न्याय ग्रन्थ का नाम न्याय मंजरी था। यह ग्रन्थ आज उपलब्ध नहीं है, लेकिन उसमें से कुछ परिच्छेदों के उद्धरण दूसरे ग्रन्थों में मिलते हैं। न्यायमंजरीकार जयंतभट्ट वाचस्पतिमिश्र का गुरु नहीं था।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. दूसरे कई विद्वानों के अनुसार भामती वाचस्पति की पत्नी का नाम था।
  2. लेकिन कोई भी वैदिक इसे मान्यता नहीं देगा
  3. लिंग विध्यर्थक वाक्य में क्रियापद से जोड़ा जाने वाला प्रत्यय है। जैसे कि 'स्वर्गेच्छु व्यक्ति यज्ञ करे' इसमें 'करे' में रहने वाला 'ए' प्रत्यय।
  4. इसके बारे में एक उल्लेखनीय बात यह मानी जाती है कि मंडनमिश्र ने अपनी 'ब्रह्मसिद्धि' में स्फोटवाद का आग्रही समर्थन किया है, लेकिन उसी मंडनमिश्र के विश्वविवेक की टीका में वाचस्पतिमिश्र ने स्फोटवाद का खंडन किया है।
  5. यही मत नैयायिकों ने स्वीकृत किया है
  6. लोहे में भड़कने वाली आग से धुंआ नहीं निकलता है
  7. देखिए डॉक्टर हसुरकर, पृष्ठ 145- 149

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