गोरखनाथ  

गोरखनाथ
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पूरा नाम गोरखनाथ
अन्य नाम गोरक्षनाथ
गुरु मत्स्येन्द्र, जालंधर
मुख्य रचनाएँ 'अमवस्क', 'अवधूत गीता','गोरक्षकौमुदी', 'गोरक्ष चिकित्सा', 'गोरक्षपद्धति','गोरक्षशतक,
भाषा संस्कृत, हिन्दी
प्रसिद्धि लेखक, साहित्यकार
नागरिकता भारतीय
संबंधित लेख डा. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल, डा. हजारीप्रसाद द्विवेदी
अन्य जानकारी गोरक्षमत के योग को पंतजलि वर्णित 'अष्टांगयोग' से भिन्न बताने के लिए 'षडंग योग' कहते हैं। इसमें योग के केवल छ: अंगों का ही महत्व है। प्रथम दो अर्थात् यम और नियम इसमें गौण है।

गोरखनाथ अथवा गोरक्षनाथ एक 'नाथ योगी' थे। सिद्धों से सम्बद्ध सभी जनश्रुतियाँ इस बात पर एकमत हैं कि नाथ सम्प्रदाय के आदि प्रवर्तक चार महायोगी हुए हैं। आदिनाथ स्वयं शिव ही हैं। उनके दो शिष्य हुए, जालंधरनाथ और मत्स्येन्द्रनाथ या मच्छन्दरनाथ। जालंधरनाथ के शिष्य थे- 'कृष्णपाद'[1] और मत्स्येंन्द्रनाथ के 'गोरख' अथवा 'गोरक्ष' नाथ। इस प्रकार ये चार सिद्ध योगीश्वर नाथ सम्प्रदाय के मूल प्रवर्तक हैं।

अनुश्रुतियाँ

परवर्ती नाथ सम्प्रदाय में मत्स्येन्द्रनाथ और गोरखनाथ का ही अधिक उल्लेख पाया जाता है। इन सिद्धों के बारे में सारे देश में जो अनुश्रुतियाँ और दन्त कथाएँ प्रचलित हैं, उनसे आसानी से इन निष्कर्षों पर पहुँचा जा सकता है-

  1. मत्स्येन्द्र और जालंधर समसामयिक गुरुभाई थे और दोनों के प्रधान शिष्य क्रमश: गोरखनाथ और कृष्णपाद[2] थे।
  2. मत्स्येन्द्रनाथ किसी विशेष प्रकार के योग मार्ग के प्रवर्तक थे, परन्तु बाद में किसी ऐसी साधना में जा फँसे थे, जहाँ पर स्त्रियों का अबाध संसर्ग माना जाता था, 'कौलज्ञान निर्णय' से जान पड़ता है कि यह वामाचारी कौल साधना थी, जिसे सिद्ध कौशल मत कहते थे; गोरखनाथ ने अपने गुरु का वहाँ से उद्धार किया था।
  3. शुरू से ही मत्स्येन्द्र और गोरख की साधना पद्धति जालंधर और कृष्णपाद की साधना पद्धति से भिन्न थी।

समय काल

गोरखनाथ के समय के बारे में निम्न निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं-

  1. मत्स्येन्द्रनाथ द्वारा लिखित कहे जाने वाले ग्रन्थ 'कौलज्ञान निर्णय' की प्रति का लिपिकाल डाक्टर प्रबोधचन्द्र बाग़ची के अनुसार 11 शती के पूर्व का है। यदि यह ठीक हो तो मत्स्येन्द्रनाथ का समय ईस्वी 11वीं शती से पहले होना चाहिए।
  2. सुप्रसिद्ध कश्मीरी आचार्य अभिनवगुप्त के तन्त्रालोक में मच्छन्द विभु को बड़े आदर से स्मरण किया गया है। अभिनवगुप्त निश्चित् रूप से सन् ई. की दसवीं शती के अन्त और ग्यारवीं शती के प्रारम्भ में विद्यमान थे। इस प्रकार मत्स्येन्द्रनाथ इस समय से काफ़ी समय पहले हुए होंगे।
  3. मत्स्येन्द्रनाथ का एक नाम 'मीननाथ' है। ब्रजयनी सिद्धों में एक मीनपा हैं, जो मत्स्येन्द्रनाथ के पिता बताये गये हैं। मीनपा राजा देवपाल के राजत्वकाल में हुए थे। दवेपाल का राज्यकाल 809 से 849 ई. तक है। इससे सिद्ध होता है कि मत्स्येन्द्र ई. सन् की नवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में विद्यमान थे।
  4. तिब्बती परम्परा के अनुसार कानपा[3] राजा देवपाल के राज्यकाल में आविर्भाव हुए थे। इस प्रकार मत्स्येन्द्रनाथ आदि सिद्धों का समय ई. सन के नवीं शताब्दी का उत्तरार्ध और दसवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध समझना चाहिए।

कुछ ऐसी भी दन्तकथाएँ हैं जो गोरखनाथ का समय बहुत बाद में रखने का संकेत करती हैं, जैसे कबीर और नानक से उनका संवाद, परन्तु ये बहुत बाद की बातें हैं। जब मान लिया गया था कि गोरखनाथ चिरंजीवी हैं। गूँगा की कहानी, पश्चिमी नाथों की अनुश्रुतियाँ, बंगाल की दन्तकथाएँ और धर्मपूजा सम्प्रदाय की प्रसिद्धियाँ, महाराष्ट्र के सन्त ज्ञानेश्वर आदि की परम्पराएँ इस काल को 1200 ई. के पूर्व ले जाती हैं। इस बात का ऐतिहासिक प्रमाण है कि ईस्वी तेरहवीं शताब्दी में गोरखपुर का मठ ढहा दिया गया था, इसीलिए इसके बहुत से पूर्व गोरखनाथ का समय होना चाहिए। बहुत से पूर्ववर्ती मत गोरक्षनाथी सम्प्रदाय में अंतर्भुक्त हो गये थे। इनकी अनुश्रुतियों का सम्बन्ध भी गोरखनाथ से जोड़ दिया गया है। इसलिए कभी-कभी गोरक्षनाथ का समय और भी पहले निश्चित् किया जाता है। लेखक ने 'नाथ-सम्प्रदाय' नामक पुस्तक में उन सम्प्रदायों के अंतर्भुक्त होने की प्रक्रिया का सविस्तार विवेचन किया है। सब बातों पर विचार करने से गोरखनाथ का समय ईस्वी सन् की नवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ही माना जाना ठीक जान पड़ता है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. कान्हापाद, कान्हपा, कानफा
  2. कानपा
  3. कृष्णपाद
  4. त्रिक दर्शन
  5. पृ. 8-9
  6. सहायक ग्रन्थ-नाथ सम्प्रदाय, डॉक्टर हजारीप्रसाद द्विवेदी।

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