नागसेन  

नागसेन एक प्रसिद्ध तथा प्रमुख बौद्ध भिक्षुक था, जिसने यवन सम्राट मिलिन्द से वाद-विवाद किया था। सम्भवत: इस वाद-विवाद के फलस्वरूप ही मिलिन्द नागसेन से प्रभावित हुआ और उसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था। नागसेन के जीवन के बारे में "मिलिन्द प्रश्न" (मिलिन्दपन्ह)[1] में जो कुछ भी उल्लेख मिलता है, उससे इतना ही मालूम होता है, कि हिमालय-पर्वत के पास (पंजाब) में कजंगल गाँव में सोनुत्तर ब्राह्मण के घर में उनका जन्म हुआ था।

विद्या प्राप्ति

पिता के घर में ही रहते हुए उन्होंने ब्राह्मणों की विद्या वेद, व्याकरण आदि को पढ़ लिया था। इससे उनका परिचय उस समय वत्तनीय (वर्त्तनीय) स्थान में रहते एक विद्वान् भिक्षु रोहण से हुआ, जिससे नागसेन बौद्ध दर्शन की ओर झुके। रोहण के शिष्य बन वह उनके साथ विजम्भवस्तु [2] होते हिमालय में रक्षिततल नामक स्थान में गये। वहीं गुरु ने उन्हें उस समय की रीति के अनुसार कंठस्थ किये सारे बौद्ध वाड्मय को पढाया और पढ़ने की इच्छा से गुरु की आज्ञा के अनुसार वह एक बार फिर पैदल चलते वर्त्तनीय में एक प्रख्यात विद्वान् अश्वगुप्त के पास पहुँचे।

प्रतिभा सम्पन्न

अश्वगुप्त अभी इस नये विद्यार्थी की विद्या-बुद्धि की परख कर ही रहे थे, कि एक दिन किसी गृहस्थ के घर भोजन के उपरांत नियम के अनुसार दिया जाने वाला धर्मोपदेश नागसेन के जिम्मे पड़ा। नागसेन की प्रतिभा उससे खुल गई और अश्वगुप्त ने इस प्रतिभाशाली तरुण को और योग्य हाथों में सौंपनें के लिए पटना (पाटलिपुत्र) के 'अशोका राम बिहार' में वास करने वाले आचार्य 'धर्मरक्षित' के पास भेज दिया। सौ योजन पर अवस्थित पटना पैदल जाना आसान काम न था, किंतु अब भिक्षु बराबर आते-आते रहते थे, व्यापारियों का साथ (कारवाँ) भी एक-न-एक चलता ही रहता था। नागसेन को एक ऐसा ही कारवाँ मिल गया, जिसके स्वामी ने बड़ी खुशी से इस तरुण विद्वान् को खिलाते-पिलाते साथ ले चलना स्वीकार किया।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

दर्शन दिग्दर्शन |लेखक: राहुल सांकृत्यायन |प्रकाशक: किताब महल, इलाहाबाद |पृष्ठ संख्या: 422-430 |ISBN: 81-225-0027-7

  1. 'मिलिन्द प्रश्न, अनुवादक भिक्षु जगदीश काश्यप, 1637 ई.
  2. वर्त्तनीय, कंगजल और शायद विजम्भवस्तु भी स्यालकोट के ज़िले में थे।

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