आनन्दवर्धन  

आनन्दवर्धन 9वीं शती ई. के उत्तरार्ध में कश्मीर निवासी संस्कृत के काव्यशास्त्री तथा 'ध्वनि सम्प्रदाय' के प्रवर्तक आचार्य थे। इनकी कृति 'ध्वन्यालोक' बहुत प्रसिद्ध है। 'ध्वनि सम्प्रदाय' का सम्बन्ध मुख्यत: शब्द शक्ति और अर्थविज्ञान से है। शब्द शक्ति भाषा दर्शन का विषय है और अर्थविज्ञान भाषा दर्शन का विषय होते हुए काव्य शास्त्र और सामान्यत: सौंदर्यशास्त्र के लिए भी महत्त्वपूर्ण है। आनन्दवर्धन ने अर्थ का विवेचन प्रधानत: काव्य के सन्दर्भ में किया है। अनेक अनुसार काव्य ध्वनि है। ध्वनि उस विशिष्ट काव्य की संज्ञा है, जिसमें शब्द और वाच्य अर्थ की अपेक्षा प्रतीयमान अर्थ का चमत्कार अधिक होता है। आनन्दवर्धन का महत्त्व प्रधानत: एक भाषा-दार्शनिक व एक सौंदर्य शास्त्री के रूप में है।

समय एवं कृतित्व

आनन्दवर्धन का समय नवीं शती ईसवी है। ये कश्मीर के महाराज अवन्तिवर्मा के आश्रित कवि थे। ये मुक्तागण, शिवस्वामी तथा रत्नाकर के समकालीन थे। अवन्तिवर्मा का समय 855 से 883 ई. तक माना जाता है। इनके पिता का नाम 'नोण' अथवा 'नोणोपाध्याय' था, जैसा कि उनके ग्रन्थ 'ध्वन्यालोक' में उल्लिखित है। अपने ग्रन्थ 'देवीशतक' में आनन्दवर्धन ने अपने को 'नोणसुत' कहा है। ध्वन्यालोक और देवीशतक के अतिरिक्त आनन्दवर्धन के और भी ग्रन्थ हैं, जैसे- अर्जुन चरित, सविक्रमबाण लीला, विनिश्चय टीका विवृति और तत्वालोक। इसमें विनिश्चया टीका विवृति और तत्वालोक दार्शनिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं, किन्तु ये अब उपलब्ध नहीं हैं। इनके उपलब्ध ग्रन्थों में 'ध्वन्यालोक' सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है।

आलोचक मतभेद

'ध्वन्यालोक' के चार उद्योत हैं। इस ग्रन्थ के दो भाग हैं, कारिका और वृत्ति। आलोचकों में इस बात को लेकर मतभेद है कि ये दोनों आनन्दवर्धन की कृतियाँ हैं अथवा दो भिन्न-भिन्न व्यक्तियों की। परन्तु टीकाकार अभिनवगुप्त के अनुसार दोनों ही उनकी कृतियाँ हैं। इस ग्रन्थ में आनन्दवर्धन ने ध्वनि के विरुद्ध सम्भाव्य आपत्तियों का निराकरण करके ध्वनि की स्थापना तथा व्यंजना शक्ति का विवेचन किया है एवं अमिधा से उसकी श्रेष्ठता प्रतिपादित की है। इसके पश्चात् ध्वनि के भेद, उसकी व्यापकता, अर्थात् प्रकृति प्रत्यय से लेकर महाकाव्यों तक में उसकी व्यापकता का विवेचन किया है। इसमें गुण, रीति एवं अलंकारों के साथ ध्वनि का उचित सम्बन्ध निरूपित किया है। रस का विरोधाविरोध दर्शाकर इस पर अत्यन्त बल दिया गया है। शान्त रस को परमानन्द माना गया है। अन्त में कवि की प्रतिभा शक्ति का महत्त्व बतलाया गया है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. ध्वन्यालोक 9/13
  2. ध्वन्यालोक, तृतीय उद्योत के अन्त की वृत्ति

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