स्वामी रामानंद  

स्वामी रामानंद

वैष्णवाचार्य स्वामी रामानंद का जन्म 1299 ई. में प्रयाग में हुआ था। इनके विचारों पर गुरु राघवानंद के विशिष्टा द्वैत मत का अधिक प्रभाव पड़ा। अपने मत के प्रचार के लिए इन्होंने भारत के विभिन्न तीर्थों की यात्रा कीं। तीर्थाटन से लौटने पर अनेक गुरु-भाइयों ने यह कहकर रामानंद के साथ भोजन करने से इंकार कर दिया कि इन्होंने तीर्थाटन में छुआछूत का विचार, नहीं किया होगा। इस पर रामानंद ने अपने शिष्यों को नया संप्रदाय चलाने की सलाह दी। रामानंद संप्रदाय में ये बातें सम्मिलित हैं-

  • द्विभुजराम की परम उपासना,
  • 'आउम् रामाय नाम:' इस संप्रदाय का मन्त्र है।
  • संप्रदाय का नाम 'श्रीसंप्रदाय' तथा 'वैरागी संप्रदाय' भी है।
  • इस संप्रदाय में आचार पर अधिक बल नहीं दिया जाता। कर्मकांड का महत्त्व यहाँ बहुत कम है। इस संप्रदाय के अनुयायी 'अवधूत' और 'तपसी' भी कहलाते हैं। रामानंद के धार्मिक आंदोलन में जाति-पांति का भेद-भाव नहीं था। उनके शिष्यों में हिंदुओं की विभिन्न जातियों के लोगों के साथ-साथ मुसलमान भी थे। भारत में रामानंदी साधुओं की संख्या सर्वाधिक है।

सामान्य व्यक्ति के लिये आदर्श

  • महापुरुषों का जीवन सामान्य व्यक्ति के लिये आदर्श होता है। महापुरुष स्थूल शरीर के प्रति इतने उदासीन होते हैं। कि उन्हें उसका परिचय देने की आवश्यकता ही नहीं जान पड़ती। भारतीय संस्कृति में शरीर के परिचय का कोई मूल्य नहीं है।
  • श्री रामानन्दाचार्य जी का परिचय व्यापक जनों को केवल इतना ही प्राप्त है कि उन तेजोमय, वीतराग, निष्पक्ष महापुरुष ने काशी के पंचगंगा घाट स्थित श्रीमठको अपने निवास से पवित्र किया।
  • आचार्य का काशी-जैसी विद्वानों एवं महात्माओं की निवास भूमि में कितना महत्त्व था, यह इसी से सिद्ध है कि महात्मा कबीरदास जी ने उनके चरण धोखे से हृदय पर लेकर उनके मुख से निकले 'राम'- नाम को गुरु-मन्त्र मान लिया।
  • आचार्य ने शिव एवं विष्णु के उपासकों में चले आते अज्ञान मूलक द्वेष भाव को दूर किया। अपने तप: प्रभाव से यवन-शासकों के अत्याचार को शान्त किया और श्री अवध चक्रवर्ती दशरथ नन्दन राघवेन्द्र की भक्ति के प्रवाह से प्राणियों के अन्त: कलुष का निराकरण किया।
  • द्वादश महाभागवत आचार्य के मुख्य शिष्य माने गये हैं। इनके अतिरिक्त कबीर, पीपा, रैदास आदि परम 'विरागी' महापुरुष आचार्य के शिष्य हो गये हैं। आचार्य ने जिस रामानन्दीय सम्प्रदाय का प्रवर्तन किया, उसने हिन्दू-समुदाय की आपत्ति के समय रक्षा की। भगवान का द्वार बिना किसी भेदभाव के, बिना जाति-योग्यता आदि का विचार किये सबके लिये खुला है, उन्होंने उदघोष किया था-सर्वे प्रपत्तेधिकारिणो मत्ताः, सब उन मर्यादा पुरुषोत्तम को पुकारने के समान अधिकारी हैं- इस परम सत्य को आचार्य ने व्यावहारिक रूप में स्थापित किया है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

[सहायक ग्रन्थ- रामानन्द सम्प्रदाय-बदरीनारायण श्रीवास्तव।]

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